राह ने देखा नहीं उसे...
पाकिस्तान के मशहूर शायर जीशान साहिल पर जावेद आलम की टिप्पणी
पिछले दिनों पाकिस्तान के नामवर शायर जीशान साहिल गुजर गए। अलग तरह के लबो-लहजे में शायरी करने वाले इस शायर को कराची पर लिखी उसकी नज्मों ने हर सू मशहूर कर दिया। तब उसकी उन नज्मों पर भी लोगों की नजर पड़ी, जिनसे हम-आपके सरोकार भी जुड़े हैं।
गर्दे-सफर में राह ने देखा नहीं मुझे इक उम्र महो-माह ने देखा नहीं मुझे।
शायर के के दो रवैये होते हैं। अपनी वाली पर आ जाए तो सीधे खुदा से टकराने जाता है। इंकिसार (विनम्रता) दिखाए तो जर्रे(कण) से भी कमतर होकर पेश आता है। जीशान साहिल की इस गजल में दूसरे वाला यानी इंकिसारी वाला रूख मिलता है। \इस शेर को ही देखें तो वह कह रहा है कि रास्ते की धूल (गर्दे-सफर) में राह ने मुझे देखा ही नहीं। यानी में इतना कमतर, हकीर हूं कि रास्ता भी मुझे जैसे मामूली मुसाफिर पर कोई तवज्जो नहीं देता। इसीलिए महो-माह (सूरज-चांद)ने भी एक अरसे तक मेरी जानिब नजर नहीं की। हालांकि इस शेर में यह मफ्हूम भी पोशीदा है कि हूं तो मैं भी बुहत अहम, अलबत्ता किसी ने मुझ पर तवज्जो नहीं दी।
दस साल पहले जीशान की गजलें पढ़ने पर एक नए जीशान से मेरा तार्रूफ हुआ। कराची की एक बेहद सक्रिय व मिलनसार शख्सियत रफीक नक्श ने मुझे तहरीर के कुछ शुमारे (अंक) इनायत फरमाए थे उन्हीं में से एक में जीशान की गजलें भी थीं।
इससे पहले मैं नज्म-निगार जीशान को जानता था, जिसकी कुछ अलग लबो-लहजे वाली नज्में उर्दू के प्रतिष्ठित रिसालों (पत्रिकाअों) में नजर आती थीं। तब वह उतना मशहूर नहीं था। चुनिंदा रिसालों में छपता और संजीदा लोगों की महफिलों में जगह पाता। न तब उसने वह नज्म कही थी, जिसमें किसी खूबसूरत लड़की को मंजिल पर पहुंचाकर जहाज को उससे बिछुड़ने का दुःख होता है। इतना कि वह फिर से आसमान की बुलंदियों में खुद को गुम करने चल पड़ता है। किसी को दुःख में खुद को गुम कर देने की जो इंसानी फितरत (प्रकृति) है, वह नज्म उसको पूरी खूबसूरती से बयान करती है। न ही उस वक्त तक उसने खून में लिथड़े हुए कराची पर लहू रंग नज्में लिखी थी। असल में तो शोहरत इन्हीं नज्मों का हाथ पकड़कर उस तक चली आई थी। उसे इस शोहरत की कोई जरूरत नहीं थी, न ही तमन्ना। एक तो वैसे वह छोटे-से कद का दुबला-पतला आदमी था। तिस पर तबीयत ऐसी कि न ज्यादा बोलना न खुद को आगे रखना। कराची पर लिखी उसकी नज्में बताती हैं कि कि अल्फाज कैसे एक शहर के दर्द में जो हमारी रगों में दौड़ता और दिलों में बसता है। इन नज्मों के साथ ही साथ उसने कई ऐसी नज्में हमें दी कसक बनकर हमारे साथ रहती हैं और टीस बनकर चुभती रहती हैं। इन नज्मों में हमारे दौर की बेहिसी है, तन्हाई है। दुःख-दर्द, कसक, तड़प है। सबसे बड़ी बात यह है कि इनमें जिंदगी की सबसे लाजिमी शय मुहब्बत है। हमारे दौर की मुहब्बत भी और सदा रह जाने वाली भी।
जीशान की नज्में इस दुनिया का नजारा कराती हैं। हम नज्जारगी में खोए रहे और \वह हाथ छुड़ाकर खामुशी से चला गया। दो बार उससे मुलाकात का मौका मिला। लंबे-लंबे अरसे में। उन छोटी-छोटी मुलाकातों के बावजूद कहा जा सकता है कि शेर उसकी बिलकुल सच्ची तस्वीर पेश करता हैः
हर मौजे-दर्द खुद में उतारे चला गया
साहिल दिले-तबाह ने देखा नहीं मुझे।
जावेद आलम
बेजान चीजों को जिंदा करता शायर
पाकिस्तान के मशहूर शायर जीशान साहिल का १२ अप्रैल को ४७ की उम्र में इंतकाल हो गया। यह खबर युवा कवि-कहानीकार गीत चतुर्वेदी के ब्लॉग वैतागवाड़ी से लगी। फ़हमीदा रियाज़ ने जब साहिल की नज़्म जहाज को पढ़ा, तो अखबार 'डान' में लिखा- 'ज़ीशान की नज़्मों वह ताक़त है, जो बेजान चीज़ों को भी जिंदा कर देती है।' आप भी उस ताकत को महसूस करिए।
जहाज
हमेशा हैरान कर देने वाली
एक लड़की को लेकर आने वाला जहाज़
उसे अपने अंदर समो के
कितनी ख़ुशी होती है जहाज़ को
वो लफ़्ज़ों में बयान नहीं कर सकता
एयरपोर्ट से बाहर जाकर
शहर में खो जाएगी यह लड़की
सोचता है जहाज़ और बार-बार
आसमान के चक्कर लगाने लगता है
ज़मीन को छूने से पहले
बादलों में छुपने की कोशिश करता है
अगर मैं दोबारा उसके घर के ऊपर से गुज़रा
तो क्या पहचान पाएगी मुझे?
सोचता है जहाज़ और आदमी की तरह दुखी होने लगता है
आंसू नहीं निकल सकते उसके,
अपने परों को आंखों पर नहीं रख सकता
साइंस कहती है
मशीन होता है जहाज़
मोहब्बत नहीं कर सकता
सुनता है जहाज़
और बेक़रार होकर फिर से उड़ जाता है.
अनुवाद ः अफलाक कामिल
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