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एक स्तम्भ का अकेलापन

ख्यात कवि केदारनाथ सिंह का गद्य

बहुत दिनों बाद अपनी पुरानी पुस्तकों और पत्रिकाअों को टटोल रहा था तो हाथ लगा कवि-आलोचक अशोक वाजपेयी द्वारा संपादित पूर्वग्रह का वह खास अंक जो कवियों के गद्य पर एकाग्र है। इसमें आखिर में मेरे प्रिय कवि केदारनाथ सिंह का एक उम्दा गद्य प्रकाशित है- एक स्तम्भ का अकेलापन। पूर्वग्रह के प्रति आभार मानते हुए इसे पढ़िए और कवि के गद्य का आनंद लीजिए। इसमें पकती हुई जमीन की खुशबू मिलेगी।
एक स्तम्भ का अकेलापन केदारनाथ सिहं
यह एक छोटा-सा कस्बा है जहां मैं खड़ा हूं। देश के विशाल नक्शे में इसके लिए कोई जगह नहीं है। पर यह है और सदियों से उसी तरह घिसट रहा है। यहां मैं किसी काम से नहीं खड़ा हूं। सचाई यह है कि मजबूरी में खड़ा हूं। जिस बस में यात्रा कर रहा था, उसे यहां आकर खराब होना था। सामने कुछ दूरी पर ऊंचा एक स्तम्भ दिखाई पड़ रहा है। उसे पहले भी की बार बस से आते-जाते देख चुका हूं। स्तम्भ की बनावट मुझे आकर्षित करती है। सो, उसी दिशा में चल पड़ता हूं। पास जाकर देखता हूं, वह बड़ा-सा सुंदर स्तम्भ है-लाल-लाल लाहौरी ईंटों से बना हुआ है। कई सवाल मेरे मन में उठते हैं। क्यों है यह स्तम्भ? कस्बे के बाहर उस झाड़-झंखाड़ के बीच वह इस तरह क्यों खड़ा है-उपेक्षित और अकेला? इस कस्बे उस स्तम्भ का रिश्ता क्या है? ये सारे सवाल मैं एक साथ पूछना चाहता हूं-यदि कोई मिल जाए।
इस कस्बे का नाम मैं नहीं जानता। पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। भला अपने ही मोहल्ले के कितने लोगों के नाम मैं जानता हूं। फिर भी कहता हूं कि वह मेरा मोहल्ला है। जैसे जैसे अंदर धंसता हूं, कस्बा अपने भेद खोलने लगता है। हर कस्बे का चरित्र बहुत कुछ एक ठेठ हिंदुस्तानी चेहरे की तरह होता है, जो सहानुभूति की जरा-सी आंच पाते ही मोम की तरह पिघलने लगता है। चार कदम अंदर जाने के बाद कस्बा मेरे लिए अपरिचित नहीं रह जाता है। लगता है, इसे बरसों से जानता हूं। वही गुड़, मटर, चना-आलू और सब जैसे मिट्टी के तेल की एक अदृश्य गंध में डूबे हुए। और हां, वही लोग भी जो एख ही साथ दुखी भी दिखते हैं और सुखी भी। सुख और दुख का ऐसा दुर्लभ सह-अस्तित्व सिर्फ एक ठेठ हिंदुस्तानी चेहरे पर ही देखा जा सकता है।
यह छोटा-सा कस्बा एक नदी के किनारे बसा है। नदी का कोई न कोई नाम जरूर होगा। पर मैं नदी के रहस्य से बचना चाहता हूं। वह एक अलग दुनिया है। अभी तो वह स्तम्भ ही मेरे लिए चुनौती है। हां, नदीं के किनारे बालू की एक बहुत बड़ी टाल है, जहां कुछ ट्रक खड़े हैं और दो-तीन बैलगाड़ियां भी। उन सब पर बालू लादा जा रहा है। पूछने पर पता चलता है, इस कस्बे का सारा अर्थतंत्र बालू के व्यवसाय पर ही टिका है। बालू पर टिका अर्थतंत्र-है न अद्भुत। कितनी दूरगामी व्यंजना है इस रूपक में। नावें दूर-दूर से बालू लादकर लाती हैं और तट पर उतार देती हैं। फिर वहां से ट्रक और बैलगाड़ियां उसे लादकर आगे ले जाती हैं। कुछ दूर तक दोनों साथ-साथ जाती हैं सुदूर गांवों की अोर।
एक आदमी दिखता है। वह बकरियां चरा रहा है सोचता हूं, उस स्तम्भ के बारे में पूछूं पर अटपटा लगता है। इसलिए चुप रह जाता हूं। फिर एक और आदमी दिखता है। वह पहलवान जैसा लगता है। सोचता हूं, इससे क्या पूछना? दया आती है-पता नहीं खुद पर या उस पहलवान जैसे आदमी पर? जो अगला आदमी मिलता है वह जरा भरोसे का दिखता है। सुर्ती का गठ्ठर पीछ पर बांधे वह बाजार की अोर लपका जा रहा है। इतंजार करता हूं वह रूके तो पूछूं। पर वह रूकता नहीं, इसलिए आवाज देता हूं-भाई साहब मुझे आपकी मदद चाहिए। आदमी रुक जाता है। उसे लगता है, मैं किसी मुसीबत में हूं। जब नजदीक जाकर उससे स्तम्भ के बारे में पूछता हूं तो वह हंसने लगता है। जाहिर है, उसे इस तरह के सवालों का सामना पहली बार करना पड़ रहा है। वह बताता है कि वह लाल ईंटों वाला खम्भा बहुत पुराना है। वह खम्भा ही कहता है-स्तम्भ उसकी भाषा का शब्द नहीं है पर दुनिया मेरे लिए सिर्फ भाषा का सवाल नहीं है। इसलिए इस शब्द-परिवर्तन को चुपचाप स्वीकार कर लेता हूं। मुझे उन लोगों से ईर्ष्या होती है जो दुनिया के सारे सवालों को भाषा के सवालों में घटा लेते हैं। वह खम्भा कितना पुराना है, यह पूछने पर वह कुछ सोच में पड़ जाता है। जहां काल का अनंत प्रवाह हो, वहां दिन, महिना, साल और सदियां कैसी? उसे कुछ भी याद नहीं। हां, इतना वह जरूर बताता है कि उस लाल ईंटों वाले खम्भे को किसी अंग्रेज अफसर ने बनवाया था-शायद अपनी मृत पत्नी की याद में। तब से वह वहां इसी तरह खड़ा है-इस कस्बे की स्मृति में गहराई तक धंसा हुआ।
जो भी हो, देखता हूं स्तम्भ जगह-जगह से क्षत-विक्षत हो जाने के बाद भी सुंदर है। शायद यही बात उसे बचाए हुए है। हमले उस पर कई हुए-सिर्फ आंधी-तूफान और भूकम्प के हमले ही नहीं। लोगों की क्रुद्ध भीड़ के हमले भी। सन् ४२ में उस पर जनाक्रोश का पहला हमला हुआ पर न जाने कैसे बच गया। शायद उसकी सुंदरता ने ही उसे बचा लिया हो। दूसरा हमला अभी कोई १५-२० साल पहले हुआ था, जब युवकों की एक टोली ने निश्चय किया कि उसे हथोड़ियों से क्षत-विक्षत कर डाला जाए-क्योंकि वह इश कस्बे को बार-बार अपनी गुलामी के दिनों की याद दिलाता है। पर इस बार स्तम्भ की सुंदरता नहीं, स्वयं कस्बे के लोग बीच में आए गए। उन्होंने युवकों से कहा-भैया इसे क्यों तोड़ते हो। बस चुपचाप खड़ा ही तो है। किसी का कुछ बिगाड़ता तो नहीं। इस तरह स्तम्भ फिर बच गया। अबकी लोगों के भीतर की सुंदरता ने उसे बचाया।
सो स्तम्भ टूटने से बच गया। बच गया, इसलिए खड़ा है। अब इस कस्बे में वह उसी तरह है, जैसे नदी बह रही है, बकरियां चर रही है और लोग अपनी गठरियां लिए घर वापस जा रहे हैं। कस्बे की यह नागरिकता जो उसे मिली है यों ही नहीं मिल गई है। सम्बे समय तक कस्बे के बाहर उसे एक टांग पर खड़े रहकर इसका इंतजार करना पड़ा है-जैसे एक कलाकृति को कालजयी होने के लिए गहरी पीड़ा और अपार धैर्य के साथ लम्बा इंतजार करना पड़ता है।
नावें बालू उतार कर वापस जा रही हैं। स्तम्भ को कहीं नहीं जाना है। वह यहां की मिट्टी और हवा को छोड़कर जा भी कहां सकता है। हां, मेरी बस जाने के लिए तैयार जरूर हो गई है। मुझे भी जाना होगा।
जब बस में बैठता हूं तो स्तम्भ का उठा हुआ मस्तक फिर दिखाई पड़ता है। मुझ उस दुकानदार के शब्द याद आते हैं- भैया, दुकानदार आदमी हूं। इतिहास-पुराना नहीं जानता पर आते-जाते यह लाल-लाल ईंटों वाला खम्भा दिख जाता है तो अच्छा लगता है।
जो अच्छा लगता है, वह चुपचाप वहां खड़ा रहे, इसमें हर्ज क्या है?
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