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अवसाद के झीने पर्दे में

युवा कवि आशुतोष दुबे की कविताएं


बहुत दिनों बाद् अपने दोस्त आशुतोष दुबे से उसके घर मुलाकात हुई। चार-छह बार फोन पर कह चुका था कि आ रहा हूं आ रहा हूं। उसका नया कविता संग्रह देखने की गहरी उत्सुकता भी थी। यह संग्रह हाल ही में राजकमल ने छापा है। मैं आशुतोष की कविताओं पर शुरुआत से ही फिदा रहा हूं। इसलिए नहीं कि वह दोस्त है बल्कि इसलिए कि हिंदी की ढेर औसत दर्जे की कविताअों के बीच उसकी कविताएं यह गहरी आश्वस्ति देती हैं कि अच्छे कवियों का पुनर्जन्म होता रहता है। उसकी कविताएं गहरे अवसाद के रेशों से बने और बुने गए झीने पर्दे की कविताएं हैं जिसमें करूणा का जल एक अोझल होती नदी की तरह दूर से झिममिलाता रहता है। उसके दूसरे संग्रह असंभव सारांश की तरह ही इस संग्रह यकीन की आयतें की कविताएं भी उसके कलात्मक संयम और धैर्य की साक्ष्य हैं। उसके इस नए संग्रह पर एक नोट बाद में, पहले उसकी अवसाद के पर्दे में, करुणा के जल में भीगी इन कविताअों को पढ़िए- आशुतोष दुबे की कविताएं
खोई हुई चीजें
खोई हुए चीजें जानती हैं कि हम उन्हें ढूंढ़ रहे हैं
और यह भी कि अगर वे बहुत दिनों तक न मिलीं तो मुमकिन है
वे हमारी याद से भी खो जाएं
इसलिए कुछ ढूंढ़ते हुए
वे अचानक हाथ में आ जाती हैं हमारे जीवन में फिर से दाखिल होते हुए
हम उन्हें नए सिरे से देखते हैं जिनके बगैर जीना हमने सीख लिया था
जैसे हम एक खोए हुए वक्त के हाथों
अचानक पकड़े जाते हैं
और खुद को नए सिरे से देखते हैं
जल्दी से आईने के सामने से हट जाते हैं।

ये तब की बात है
ये तब की बात है
जब लोग प्रेम में
सफल होने के लिए नहीं प्रेम की स्मृति में
घर बनाने के लिए प्रेम करते थे
वे प्रेम नहीं करते थे प्रेम का एक गल्प रचते थे निर्द्वंद्व उसमें रहते थे
ये तब की बात है
जब प्रेमीजन देवदास देख-पढ़ तड़प-तड़प जाते थे
प्रेम करने वाले प्रेमिकाअों की शादी में
दौड़-दौड़ काम करते थे
यथासमय ब्याह कर
अपना घर बसाते थे
प्रेम की स्मृति के घर में
अक्सर चले जाते थे
यथासमय लौट आते थे
अलोनी
एक दिन वह स्त्री सब्जी में नमक डालना भूल गई
दफ्तर के लिए निकली और भर बरसात में हाथ में थमा छाता खोलना भूल गई
लौटते हुए वह पता नहीं किस बस स्टॉप पर उतर गई एक सदमे की तरह उसने जाना कि वह अपना पता भूल गई है
घबराहट में उसकी सांस फंसने लगी एक दरवाजे को खोलकर उसने देखा वहां एक आदमी बिना नमक की सब्जी के लिए
अपनी पत्नी को डांट रहा था
भागकर वह सड़क पर आ गई
तेज बारिश होने लगी थी और रास्ते पर चलती तमाम औरतें अपने छातों से जूझ रही थी जो खुल नहीं रहे थे
हाथों में अनखुले छाते लिए भीगती हुई वे स्त्रियां अपना अपना पता ढूंढ़ रही थी उनके जीवन का नमक
बारिश में घुल कर बह रहा था

प्रतिक्रियाएँ

Re: अवसाद के झीने पर्दे में
बहुत खूब.
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