इस बूढ़े शहर (बनारस) के पुरानेपन के जीवित रूपक की तरह लगते हैं किशन महाराज। उनकी आदतें विचित्र लग सकती हैं। उनमें एक थकी हुई सभ्यता के जीवन मूल्य भीतर तक दाखिल हैं। जैसे स्वयं को बहुत गंभीरता से न लेना। यह आत्मसंशयशीलता का बनारसी संस्करण है। इस आदत का दूसरा अतिरेकी पहलू है उन लोगों को कैरियररिस्ट और नकली मानना जो खुद के बारे में गंभीर हैं। उन्हें पहलवानी, गहरेबाजी (खासतरह की घुड़दौड़), पतंगबाजी और मुहल्ले के लोगों से घंटों बतियाने का शौक है। उन्हें तरह तरह के आयोजनों में शामिल होने का शौक है। शहर के ज्यादातर आयोजनों के लिए वे स्थायी अतिथि हैं। उन्हें नए कपड़े पहनने और अच्छा दिखने का शौक है। धवल लहराते केशों और माथे के गोल लाल टीके ने उन्हें अतिरिक्त गरिमा दी है। उन्हें संगीत शिक्षा का एकमात्र तरीका लगता है गुरु-शिष्य परंपरा। इसके लिए बनी दूसरी संस्थाअों को वे व्यर्थ मानते हैं। पूछते हैं-आप बताइए, किस संस्थान से कोई अमजद अली खां आज तक निकला है भला।
उनके व्यक्तित्व में एक खास काट की भव्यता है। इस कारण भी उनके तबले ेक बारे में आजकल कम बाते हो पाती है। उनके पास बनारस और बाहर के अन्यान्य संगीतकारों के विपुल दिलचस्प संस्मरण हैं जिन्हें वे अगर आप बैठे रहें तो घंटों सुनाते हैं। प्रायः पचास-साठ साल और यदि वे पिताजी से सुने हुए हैं तो सौ-दो सौ साल पुराने किस्से सुनाते हुए वे किस्सागत घटना में इतना शामिल रहते हैं कि लगता है कल की बात कर रहे हैं। एक स्मृतिहीन होते समय में वे जैसे स्मरण का स्मारक हैं।
उनके पुऱखों के तबले का भिन्न भिन्न व्यक्तित्व रहा आया। बनारस बाज के आदि पुरुष राम सहाय जहां सिर्फ स्वतंत्र तबला वादन करते थे, वहां उनके उत्तरवर्ती भैरो सहाय ने इस वाद्य को संगत के लिए इस्तेमाल किया। पिता और गुरु कण्ठे महाराज तबले को अनेक उत्कर्षों तक ले गए लेकिन किशन महाराज का तबला इन सबसे विशिष्ट हुआ तो इसलिए कि अपनी निजता की रक्षा करता हुआ वह ज्यादा सामाजिक हुआ। उनके पहले बनारस का तलबा प्रचलित-पारंपरिक तालों में बेहत खूबसूरती और दक्षता से बजता आ रहा था लेकिन किशन महाराज ने उसे अप्रचलित और किंचित वक्र लयों की अोर ले गए। उसके पैटर्न को थोड़ा ऊट-पटांग किया। कठिन और अप्रचलित मात्राअों वाले तालों का पुनराविष्कृत किया। उन्हें बजाया। जाहिर है यह काम लोकप्रियता की कीमत पर हो रहा था और इस तरह बनारस ग्लैमरस तबला लोकरुचि के राजमार्ग पर उतरकर अपने अतीत की विकट, उबड़-खाबड़, अंधेरी पगडंडियों में खो जा सकता था। अनोखेलाल और सामताप्रसाद (गुदई महाराज) जैसे उनके समकालीन प्रचलित तालों को अपने भयंकर अभ्यास से पेशकारों, कायदों, पल्टों, उठानों और तिहाइयों की परिष्कृति में साधते जा रहे थे। ये हिट होना और हिट बने रहना था लेकिन किशनजी ने एक रचनात्मक विकल्प तैयार करने की कोशिश की। उनकी शैली विचित्र तो थी लेकिन ज्यादा समावेशी थी- उसमें अटपटे और बिसराए ताल भी अंट रहे थे, ज्यादा बुद्धिपरक थी- क्योंकि उसमें मात्रा और लय के विभिन्न प्रकारों को वादन में संभव करना और साधना था- ज्यादा चुनौतीपूर्ण थी-क्योकि ऐसे उबाऊ और डरावने और सामान्य जनता की समझ के बाहर के ताल बजाकर वह अप्रासंगिक और अपने दिग्गज समकालीनों के सामने कुजात हो जा सकते थे लेकिन हर रचनाकार की तरह किशन महाराज ने इस खतरे को प्रतिभा और जिद्दीपने के बल पर उठाया और चले आते रिवाज को अपनी तोड़फोड़ से नया कर लिया। तालशास्त्र के महावरे में कहें तो वे बनारस के तबले को सीधी-सादी मध्यलय से आड़लय में ले गए। वे कहते भी हैं-मेरा शहर आड़लय में ही चलता है।
आखिर यहां संत कबीर ने हिंदू-मुस्लिम समाजों की रूढ़ मूर्तियां गिराईं थीं। यहां जले भुने संस्कृत विद्वानों के बीच तुलसी बाबा ने भाखा में महाकाव्य लिखा था।
एक संगतकार उनके भीतर लेकिन हमेशा से रहा आया है। वे बहुतेरे कलाकारों के पसंदीदा तबला वादक हैं। लयकारी स्थैर्य और एकरूपता के वे अद्भुत उदाहरण हैं। उनके शिष्यों ने उन्हें लगातार एक ही लय में आठ-आठ, दस-दस घंटे तबला बजाते देखा है और इसलिए भी उनके कायल हैं। उस लगातार लय के शुरुआती मूल से इधर-उधर होने की आशंका तक असंभव मानी जाती है। यह ताल की गति में समय की गति का विन्यास है। किशन महाराज इसका श्रेय अपनी असाधारण रियाज को देते हैं और अपने रियाज के किस्से सुनाते हैं जो आज के संदर्भ में मिथकीय, असंभव और झूठे लगते हैं लेकिन इस रियाज की ही देने माना जाए कि उन्होंने शास्त्रीयोचित गाम्भीर्य और लहराती हुई लय दोनों को एक ही शैली में गूंथ दिया है।
मसलन वे कहरवा, दादरा जैसे छोटे, चलते हुए और हिट ताल भी यथोचित उल्लास से बजाते हैं या उन्हें सितारा देवी के कथक और गिरिजादेवी की ठुमरी पर बजाना बराबर अच्छा लगता है। लेकिन तबला संगत को मुख्य कलाकार के अनुगमन से अलग एक स्वायत्त रूप दिलाने वाले वे शायद पहले वादक हैं। वे कहते हैं- पहले के तबला वादक जब सितार या सरोद के साथ संगत करते थे तो सितार या सरोद वाले जो बजाते थे उसके साथ ही लिपट जाते थे, अलग नहीं बजाते थे। तो मैंने सोचा कि आज हम अलग अलग बजाएंगे और संगत करेंगे। रविजी ने सितार उठाया। मैं भी तबला मिलाकर अपनी बनारसी मुद्रा में बैठ गया। रविजी ने आलाप शुरू किया। पैंतालीस मिनट तक उन्होंने बहुत बढ़िया आलाप बजाया। उसके बाद उन्होंने गत शुरू की। जैसे ही उन्होंने गत शुरू की वैसे ही मैंने भी बहुत तगड़ा बनारसी उठान बजा दिया।। उठान की तिहाई आते ही तालियां। रविजी ने सोचा होगा कि लड़का बहुत तेज है। बोले कि वाह जी वाह, बहुत खूब। इसके बाद उन्होंने तिहाई बजाई। मैंने तबले से जवाब दिया। हमारे जवाब के बाद रविजी थोड़े कठिन रास्ते की अोर गए। मैंने उसका भी जवाब दिया...मुश्किल से पंद्रह मिनट हमने जवाब-सवाल किया होगा कि रविजी सितार रखकर हमसे लिपट गए।
व्योमेश शुक्ल
(साभार –नया ज्ञानोदय दिसंबर २००६ में प्रकाशित लेख के मुख्य अंश)
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