

कैफी आजमी की कैफियत ऐसी है कि वे बहुत ही सादा लफ्जों के लिबास में अपनी बात कहने की ताकत रखते हैं। इस लिबास में अपने नगमों, गजलों और नज्मों को ऐसा खूबसूरत आकार देते हैं कि आत्मा पर झिलमिलाते इश्क और मोहब्बत के जुगनू आपको ऐसी रोशन दुनिया में ले चलते हैं कि जहां इश्क के नजारे और इशारे, उसके नखरे औऱ अदाएं देख आप मचल मचल जाएं।
उनके नाजुक खयालों और जज्बात की तितली आपके दिल पर हौले से बैठकर ऐसे उड़ जाती है कि उसके रोशन-रंगीन रंग हमेशा के लिए आपके दिलो-दिमाग में जगमगाते रहते हैं औऱ अपनी खूशबू से महकाए रहते हैं।
यह मैं इसलिए लिख रहा हूं कि झालावाड़ से आज अलसुबह ही लौटा हूं और बारां-इंदौर की जिस बस से लौटा हूं उसके ड्राइवर ने कुछ पुराने गीतों की कैसेट लगा रखी थी। उसी में कैफी साहब का लिखा एक गीत भी बजा-मिलो न तुम तो हम घबराए, मिलो तो आंख चुराएं, हमें क्या हो गया है, हमें क्या हो गया है। तुम्ही को दिल का राज बताएं, तुम्हीं से राज छुपाएं हमें क्या हो गया है, हमें क्या हो गया है। इसे सुनकर नींद उड़ गई औऱ रात थी कि मचल मचल गई। बस इसी मचलती रात में दिल एक पुरानी महकती पगडड़ी पर उतर गया।
मैं जानता हूं हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में एक से एक नायाब फनकार हुए हैं। गाने वाले भी औऱ बजाने वाले भी लेकिन मुझे लगता है कि हमारे इस सुगम संगीत की जो अमीरी है वह किसी मायने में कमतर नहीं। क्या तो गीतकार हुए और क्या गीत लिखे, औऱ इन्हीं गीतों को संगीतकारों ने क्या नशीली और मदमस्त कर देने वाली धुनों से कालजयी बना दिया है। मैंने तो पहले भी लिखा है कि फिल्मी गीतों का लोगों की जिंदगी पर कहां कहां क्या क्या असर होता होगा इस पर शोध किया जाना चाहिए। इन गीतों ने लोगों को पता नहीं जिदंगी के किस मोड़ पर कहां औऱ कैसे कभी दुःख की बारिश में, कहीं अवसाद के अधेरे में, कभी इश्क की फूलों भरी घाटियों में तो कभी टूटन की घाटियों में कैसे राहत दी होगी, कैसे थाम लिया होगा।
इंदौर आने के बाद कुछ देर नींद ली और उठने के बाद अपनी किताबों की रैक में से कैफी आजमी की किताब बहार आए तो निकाल कर पढ़ने लगा। इसमें एक नज्म है-तसव्वुर
आप भी इसका मजा लीजिए-
तसव्वुर
ये किस तरह याद आ रही हो,
.ये ख्वाब कैसा दिखा रही हो
कि जैसे सचमुच निगाह के सामने खड़ी मुस्करा रही हो
ये जिस्म नाजुक, ये नर्म बाहें, हसीन गर्दन, सुडौल बाजू
शिगुफ्ता चेहरा, सलोनी रंगत, घनेरा जूड़ा, सियाह गेसू
नशीली आंखें, रसीली चितवन, दराज पलकें, महिन अबरू
तमाम शोखी, तमाम बिजली, तमाम मस्ती, तमाम जादू
हजारों जादू जगा रही हो ये ख्बाव कैसा दिखा रही हो
गुलाबी लब, मुस्कराते आरिज,
जबीं कुशादा, बुलंद कामत
निगाह में बिजलियों की झिलमिल
अदाअों में शबनमी लताफत
धकड़ता सीना, महकती सांसें, नवा में रस, अंखड़ियों में अमृत
हमा हलावत, हमा मलाहत
हमा तरन्नुम, हमा नजाकत
लचक लचक गुनगुना रही हो
ये ख्वाब कैसा दिखा रही हो
तो क्या मुझे तुम जिला ही लोगी,
गले से अपने लगा ही लोगी,
जो फूल जूड़े से गिर पड़ा है
तड़प के उसको उठा हो लोगी
भड़कते शोलों, कड़कती बिजली से
मेरा खिरमन बचा ही लोगी
घनेरी जुल्फों की छांव में मुझको मुस्करा के छुपा ही लोगी
कि आज तक आजमा रही हो
ये ख्वाब कैसा दिखा रही हो,
नहीं मुहब्बत की कोई कीमत, जो कोई कीमत अदा करोगी
वफा की फुर्सत न देगी दुनिया, हजार गर तुम वफा करोगी
मुझे बहलने दो रंजो गम से, सहारे कब तक दिया करोगी
जुनूं को इतना न गुदगुदाअो, पकड़ लूं दामन तो क्या करोगी
करीब बढ़ती ही आ रही हो
ये ख्वाब कैसा दिखा रही हो.
शिगुफ्ता-खिला हुआ, गेसू-केश, दराज-लंबी, अबरू-भौंहें, आरिज-गाल, जबीं-माथा, कुशादा-चौडा़, कामत-कद, लताफत-कोमलता, नवा-बोली, हमा-साकार, हलावत-मीठापन, मलाहत-लावण्य, तरन्नुम-स्वर का माधुर्य, खिरमन-खिलहान,जुनूं-उन्माद

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