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आज मेरे प्रिय कवि मंगलेश डबराल का जन्मदिन है

एक ऐसे समय में जब हा-हा हू-हू करते औऱ खाते-पीते लोगों की दुनिया में चारो अोर शोर पसरा हो तब किसी भी कवि का जन्मदिन हमारे लिए क्या मायने रखता है जिसने अपनी एक कविता प्रतिकार में लिखा है कि-
जो कुछ भी था जहां-तहां हर तरफ
शोर की तरह लिखा हुआ
उसे ही लिखता मैं
संगीत की तरह

यह एक कवि है जो आज ही के दिन (१६ मई १९४८) जन्मा था और जिसे देखे कई साल हो गए लेकिन अपनी कविता के जरिये अक्सर मेरे आसपास ही कहीं रहता है। मैंने उसकी कमीज पर शहर की रगड़ के निशान देखे हैं और उसी कमीज पर पहाड़ की छूअन का थोड़ा सा हरापन, उसी पहाड़ का जो भारी-भरकम मशीनों की आवाज से कांपता हुआ अपने बच्चों को पुकार रहा है औऱ अपने सीने से एक कर गिरते हुए पेड़ों को चुपचाप देख रहा है। इन पहाड़ों को वह बरसों पहले छोड़कर नौकरी की तलाश में तितर-बितर होता हुआ एक ऐसे शहर में आ गया था जहां रहते हुए उसने उन कविताअों को लिखा जिसमें उनकी आवाजें थी जिनकी कोई आवाज नहीं थी जैसे कि उसने लिखा धूल जो चीजों जगहों औऱ लोगों की कराह है, वह उनकी दबी-कुचली आत्मा है। इन आत्माअों की आवाज को लिखते हुए एक दिन उसके साथ ऐसा हुआ कि जब वह अपनी मां के पास गया तो मां ने उसके चेहरे से धूल-कीचड़ साफ किया और वहां चेहरे की जगह सिर्फ आड़ी-तिरछी रेखाएं ही बाकी रह गईं थी। जाहिर है वह ऐसे शहर में रहता था जहां सारी ऋतुएं खत्म हो गई थीं।
दोस्तों आज ही के दिन मेरे इस प्रिय कवि का जन्म हुआ था। आज वह साठ साल का हो गया है। ये मंगलेश डबराल हैं जिनकी कविताएं पढ़ते हुए अकसर मै अपनी रूलाई को फूटने से रोकता रहता हूं। उनकी कविताएं पढ़ता हूं औऱ रोता हूं और रोता हूं और पढ़ता हूं।
मैं यहां उनकी तीन कविताएं आपके सब के लिए प्रस्तुत कर रहा हूं। पहली कविता अपनी मां को समर्पित कर रहा हूं। दूसरी कविता अपने पिता को जिन्हें मैंने अमीर खां साहब का गाना सुनकर रोते हुए देखा है और तीसरी कविता सभी के लिए जो इस धरती को बेहद प्यार करते हैं।

मंगलेश डबराल की तीन कविताएं

मत्र्योश्का

मत्र्योश्का तुम सुंदर और मासूम हो
बच्चों की प्यारी गुड़िया तुम्हारे भीरत परते हैं
हर परत एक स्त्री है उसका खामोश इतिहास
अलग-अलग कोठरियों में कैद तुम्हारे सातों जन्म
यह कोई कला है या खेल या कोई दुख
कि तुम अपने में ही रहने चली गयीं
पांच या सात प्रतिरूपों में
तुम्हारी काठ की काया में चमकते हैं किसी स्त्री के काढ़े हुए फूल

तुम्हे खोलने पर एक-एक कर प्रकट होती हैं स्त्रियां
उनका पूरा वंश कभी न मिटने वाला जीवन
परदादी दादी मां बहन बेटी प्रेयसी
सबकी सब निहत्थी इस भीषण दुनिया से अनजान
जो सबसे बड़ी है उम्रदार
जिसके पास हैं सबसे अधिक फूल
जिसके पास हैं सबसे अधिक दुख
दीखती है सामना करने को तैयार
और जो सबसे छोटी है नवजात
जिसे तुम सभी परतों में छिपाए रहती हो
जो चारों अोर अपने पूर्वजों के कवच में लिपटी है
उसी के भीतर से आती हो तुम
और बन जाती हो बच्चों का खेल।

(मत्र्योश्का रूस की एक लोकप्रिय गुड़िया है जिसमें लकड़ी की बनी क्रमश बड़ी से छोटी होती एक जैसी गुड़या समायी रहती है। मत्र्योश्का शब्द का आशय मां या मातृमूलकता से है।)


अमीर खां

तुम खोजते रहे रहने के लिए एक घर
गाने के लिए एक घराना
तुम खोजते रहे दोस्तों की बैठकों में
किसी स्त्री के चेहरे पर
अपने ही जैसे लापरवाह शिष्यों की आवाज में
विकल करती हुई उन बंदिशों में
जिन्हें तुम एक निराकार शांति के साथ प्रस्तुत करते थे
आरोह-अवरोह के आकाश –पाताल के बीच
संगीत के मेरूखंड में तुम कहीं एक कोना ढूंढ़ते रहे
तुम बनाते रहे एक असंभव घर
सरगमों और छूट की तानों में
खिड़कियों दरवाजों के लिए खाली जगहें छोड़ते हुए
इतनी दूर से तुम सहज ही सम पर लौट आते थे
जैसे कोई लौटता है अपने घर
जहां बहुत दूर की चीजें भी बहुत पास रखी हुई होती हैं।

तुम गाते थे एक चट्टान की सिहरन
पेड़ों का रूदन, बादलों की हंसी
वियोग की तरह फैली हुई रात में उड़ता अकेलापन
तुम बार-बार मनाते रहे किसी रूठे हुए प्रेम को
देह को आत्मा और आत्मा को
देह की पुकार से भरते हुए
लेकिन कला में हम जितना बनाते-बनाते जाते हैं
उतना वह ढहता-ढहता जाता है
ऊपर उठते हुए ऊंचाइयां और ऊंची हो उठती हैं
नीचे उतरते हुए गहराइयां और गहरी

संगीत तुम्हारा एकमात्र काम था
हालांकि तुम्हें दे दिए गए थे दूसरे कई काम
जो संगीत के साथ थे बेसुर-बेताल
तुम्हें हिसाब रखना नहीं आया पैसे पता नहीं कहां खोते रहे
महान अमूर्तनों का समय खत्म हुआ आया व्यापार का युग
पाश् र्व में सुनाई देते रहे विवादी स्वर
समझ में न आने वाला गायन आवाज की सीमाएं
हिंदू संगीत मुस्लिम संगीत
घर घराना परंपरा कहीं की ईंट कहीं रोड़ा
लेकिन तुम गाते रहे बागेश्री पूरिया चंद्रकौंस
जगसम्मोहिनी अहीर भैरव कोमल ऋषभ आसावरी
और उत्तर दक्षिण हिंदी फारसी ईश्वर अल्लाह सबको एक करती
ज्ञान और गुण मांगती हंसध्वनि
इत्तिहादे मियाने मनो तो नेस्त मियाने मनो तो .. .

कठिन था घर और घराने का बनना
कठिन था संगीत का गुरुत्व थामे रहना
अंत में तुम जीवित रहे अपनी उदारता औऱ विनम्रता के किस्सों में
घरेलू महफिलों और रेडियो स्टेशनों में दर्ज धुंधली पड़ती आवाज में
तुम जीवित रहे उन संस्मरणों में
कि किसने तुम्हें आखिरी बार कहां कब क्या गाते सुना था
और हर बार तुम्हें एक परीक्षा से गुजरना पड़ा
तुम्हारा जीवन संघर्ष अपने ही संगीत से था
अपनी ही आवाज से
और १९७४ में जब कलकत्ते के पास
एक कार दुर्घटना में तुम्हारी आकस्मिक मृत्यु हुई
तुम एक दोस्त के विवाह में अपना आखिरी राग सुनाकर
लौट रहे थे अपने असंभव घर और घराने की अोर।

(इत्तिहादे मियाने मनो तो नेस्त मियाने मनो तो...अमीर खुसरो की फारसी रचना जिसका अर्थ है –तुम और मैं इस तरह एक हैं कि तुम्हारे और मेरे बीच कोई बीच नहीं है। )

चुंबन

चुंबनों का इतिहास मनुष्य जाति की ही तरह प्राचीन है लेकिन वह मशहूर या सबसे
लंबे या सबसे संक्षिप्त चुंबनों के नीरस वर्णनों या विज्ञापनों से ज्यादा कुछ नहीं है. चुंबन
एक ऐसी घटना है जो इतिहास के बाहर होती है. एक बिलकुल अवास्तविक संसार में
स्त्री-पुरूष के दीप्त होंठ परस्पर इतने पास आ जाते हैं कि उनकी सिहरन भी सुनी जा
सकती है. शरीर का तमाम रक्त होठों की अोर दौड़ रहा है. सारे विचार होटों पर इकट्ठा
हो चुके हैं. एक नम हृदय होठों तक पहुंच गया है औऱ आत्मा भी वहीं निवास करने
लगी है. यह एक ऐसा क्षण है जब एक फूल खिलता है कोई छोटी-सी चिड़िया उड़ान
भऱती है कहीं तारे चमकते हैं पृथ्वी के नीचे से पानी बहने की आवाज आती है लेकिन
प्रकृति की ये सहज चीजें अस्तित्व को कंपा देने वाले तरीके से घटित होती हैं. अंततः
रक्त पीछे लौटता है और हृदय उसे पूरे शरीर में भेजने की अपनी पुरानी भूमिका निभाने
लगता है. विचार दिमाग में पुनः प्रवेश करते हैं और आत्मा जिंदगी के बियाबान में लौट
जाती है। अब सक कुछ सामान्य है. हम एक आँधी या एक आग से बचकर आए हैं.
हम जीवित हैं औऱ इतिहास में लौट चुके हैं औऱ राहत की एक गहरी सांस ले रहे हैं.

(मंगलेश डबराल के कविता संग्रह आवाज भी एक जगह है से साभार)

प्रतिसाद

Re: आज मेरे प्रिय कवि मंगलेश डबराल का जन्मदिन है
मंगल के लिए ईश.
Re: आज मेरे प्रिय कवि मंगलेश डबराल का जन्मदिन है
मंगलेशजी मेरे भी प्रिय कवि हैं. उन्हें जन्मदिन की लख-लख बधाइयां!
Re: आज मेरे प्रिय कवि मंगलेश डबराल का जन्मदिन है
मंगलेश जी हमारे भी प्रिय कवि हैं . उन्हे जन्मदिन की ढेर सारी बधाइया. सारी कविताये प्रिय और सुंदर हैं.
Re: आज मेरे प्रिय कवि मंगलेश डबराल का जन्मदिन है
उस्‍ताद अमीर ख़ां बतर्ज मंगलेश डबराल- पिछले एक महीने से इंदौर में हूँ, लेकिन आज पहली दफ़े महसूस हुआ कि इंदौर घराने में बैठा हूं. मेहफिल तमाम.
अस्वीकरण