मैं जानती हूं, मैं कैलेंडर पर ही जिंदा रहूंगी, समय में कभी नहीं।
मर्लिन मुनरो (हॉलीवुड अभिनेत्री)
बरसों पहले इंदौर के एक टॉकीज के चुभते पटियों पर बैठकर मैंने मर्लिन मुनरो की फिल्म देखी थी औऱ मेरा यकीन करिये की उसकी जान लेवा अदाअों और बला की खूबसूरती को टकटकी बांधे देखते हुए मैं किसी बादल पर सवार था। मैं जब अंदर से अपने को टटोलता हूं तो पाता हूं कि खूबसूरती हमेशा वासना नहीं जगाती बल्कि वह आपमें बुनियादी बदलाव करती है जो किसी भी सौंदर्यबोध को समझने-बूझने की तमीज भी पैदा करती है औऱ उसको मांजती भी चलती है। ईश्वर मुझे अलौकिकता से बचाए मैंने अपने सौंदर्यबोध के लिए अप्सराअों की तरफ आंख उठाकर भी नहीं देखा है। उनसे ज्यादा सुंदर, हंसती-खिलखिलाती, रोती-तड़पती स्त्रियां मुझे इसी जीवन में अपने आसपास ही नसीब हुई हैं। वह चाहे फिल्म में हो, कविता में हो, कहानी-उपन्यासों में हो या फिर मेरे अपने ही आंगन में अपनी महक से मुझे बावला करती हुई...ये स्त्रियां हमेशा मुझे बुरी नजरों से बचाए रखती हैं औऱ मुझे इस काबिल बनाती हैं कि स्त्री से प्रेम कर सकूं।
और
एक जून १९२६ से लेकर ४ अगस्त १९६४ का जो दरमियानी समय है वह एक अंतहीन कहानी है दोस्तों। इसमें सबकुछ है-नाखुश बचपन, अंदर से तोड़ देने वाला संघर्ष, फिर कामयाबी, चकाचौंध, किसी के लिए भी ईर्षा पैदा करने वाली लोकप्रियता, तीन शादियां औऱ कुछ प्रेम के किस्से। रिश्तों की टूटन और प्रेम की प्यास। फिर अंतहीन अवसादभरी काली रातें। और अंत में एक न खत्म होने वाली कहानी। उसके मरने के इतने सालों बाद भी यह अब तक रहस्य ही है कि उसने आत्महत्या की थी या उसकी हत्या की गई। अपने कॉलेज के दिनों में मैंने एक मैग्जीन से मर्लिन के कैलेंडर का फोटो काटकर बहुत दिनों तक संभाल कर रखा था। अब वह कहीं खो गया है या फिर घर में टपकते बारिश के पानी में मेरी बहुत सारी किताबों के साथ गलकर सड़ चुका है जिसे रद्दी के साथ बाद में फेंक दिया गया था।
कई बार सोचता हूं कम से कम मेरे लिए तो मर्लिन एक तितली है जो कैलेंडर से बाहर निकलकर समय के आंगन में उड़ रही है। वे हमेशा समय में रहेंगी। आप जब जीवन की आपाधापी से हांफते हुए किसी पेड़ से थोड़ी देर के लिए पीठ टिकाएंगे तो पाएंगे कि आपके जेहन में भी उस तितली के पांव के निशान अोस की बूंदौं की तरह चमक रहे हैं...
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