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उम्मीद की शक्ल के पीछे छिपी हुई एक और शक्ल

परजानिया पर कुछ बेरतरतीब सा एक बयान



घर से आफिस के लिए निकलते समय एक अजीब से अनुभव से गुजरा हूं। समय लगभग दस बजे का रहा होगा। आईपीएल खत्म हो चुका है लेकिन विजय नगर चौराहे पर बैट-बॉल लिए बच्चों का झुंड जाता हुआ दिखा। इस शहर में भी क्रिकेट का जबरदस्त क्रेज है। यहां सीके नायडू औऱ कैप्टन मुश्ताक अली जैसे क्रिकेटर हुए हैं। तो उस झुंड में एक बच्चा मुझे रजत ढोलकिया की फिल्म परजानिया के एक पात्र परजान जैसा लगा जो अपने घर में क्रिकेट खेलता हुआ कमेंटरी करता है औऱ शोएब अख्तर की गेंद पर सिक्स मारकर इंडिया को जीता देता है। परजान दंगों में गायब हो जाता है। उसके माता-पिता अब तक उसे ढूंढ़ रहे हैं। विजय नगर चौराहे पर उस बच्चे को देखकर मुझे इस फिल्म की याद आ गई जिसका प्रदर्शन मेरे दोस्त विनीत तिवारी ने दो दिवसीय एक कार्यक्रम में किया था।


जो लोग अपने किसी बिछड़ चुके प्रिय का इंतजार करते हैं उनका चेहरा देखिए। समय चुपचाप करवट लेकर उनकी अभी अभी आई झुर्री में छिप गया है। वहां न धूप है, न छाया। आंधी में उड़ चुके हरेपन की हलकी रगड़ बाकी रह गई है। पहले वहां वसंत का कोई रंग था जो महकता था। अ ब वहां एक उभरी हुई नस दिखाई देती है जिसमें खून की आवाजाही दिखाई देती है। वे अपने दोनों पैरों पर खड़े दिखाई देते हैं लेकिन ध्यान से देखें तो उनका एक पैर थक चुका है और दूसरे ने पूरे शरीर का वजन थाम रखा है। वहां घुटने के ऊपर एक कंपकपी है जो असल में सीने के दाएं हिस्से से निकल कर वहां टहल रही है।
उनके प्रिय खो चुके हैं...
वे दोपहर की एक जलती हुई गली से निकलते हैं औऱ पाते हैं उनके सामने लंबी रात का चुप्पा गलियारा खुल गया है। वहां राहत देने के लिए कोई चंद्रमा नहीं। वे उसमें चलते हैं। उन्होंने एकदूसरे का हाथ थाम रखा है। हाथों में कई मौसम हैं, अब बारिश है। हाथों से कोई एक चीज चलती है औऱ उनकी आंखों में आकर रुक जाती है। अब धुंधलापन है। वे रूक गए हैं। दोपहर में देखी गई चीखें सूने गलियारे में उन्हें घेर कर चक्कर काटने लगती हैं। चीखों में शक्लें उभरती दिखाई देती हैं औऱ उन्हें लगता है वह अगले ही पल सचमुच उनके सामने होगा जो खो चुका है। शक्ल एक उम्मीद की शक्ल है। शक्लें हमेशा एक गहरी उम्मीद जगाती है, उसमें बहुत सारी उम्मीदें गड्डमड्ड हैं। एक उम्मीद हमेशा दूसरी उम्मीद के पीछे छिपी रहती है लेकिन रात होते होते वे पंजों में बदलकर
उनका मांस नोंचने लगती हैं।
तारे मुझे हमेशा किसी का इंतजार करते लगते हैं, पलक झपकाते हुए। मैं आसमान में तारे देखता हूं। वे अपनी पलकें झपका रहे होते हैं। कभी कोई तारा टूटकर तेजी से अपनी गतिमान चमक दिखाता गायब हो जाता है। कई बार नहीं भी। इतने सारे तारे हैं कि एक का डूबना उन्हें और अकेला कर जाता है।
उनके प्रिय खो चुके हैं...
अपने प्रिय के इतंजार में वे अपनी धुरी पर घूमते हुए नींद में भी चक्कर काट रहे हैं। उनकी नींद के आकाश में उतरते पंखों की फड़फड़ाहट है।
कोई इनसे पूछे आहट के क्या मायने होते हैं?
आहट भी एक उम्मीद है, उम्मीद भी एक शक्ल। एक और उम्मीद की शक्ल के पीछे छिपी हुई एक और शक्ल।

प्रतिक्रियाएँ

Re: उम्मीद की शक्ल के पीछे छिपी हुई एक और शक्ल
रवींद्रजी, कमाल है... इतनी शिद्दत... यह एहसास की इंतेहा है कि कहीं पर कोई गुम जाता है तो यहाँ हमारी तमाम चिट्ठियाँ बेपता हो जाती हैं... या फिर गुमशुदा लोगों की भीड़ में हम ख़ुद को खोजने निकल पड़ते हैं...
Re: उम्मीद की शक्ल के पीछे छिपी हुई एक और शक्ल
इंतज़ार में जब एक थके पांव से उम्‍मीद दूसरे पांव तक जाती है तो दिलासे की एक थपकी देकर कहती है-थकना मगर टूटना मत, टूटना तो बिखरना मत। जहां कोई राहत नहीं, कोई सकून, कोई तसल्‍ली नहीं, वहां बेशक्‍ल होते हुए भी उम्‍मीद हज़ार शक्‍लों में आकर निरंतर सामने खड़ी होती है, साथ चलती है, क्‍योंकि उम्‍मीद को रुकने का, थकने का, बिखर जाने का हक़ नहीं है। आपने बहुत सुंदर लिखा, पहले भी आपका लिखा अच्‍छा लगता रहा है।
Re: उम्मीद की शक्ल के पीछे छिपी हुई एक और शक्ल
सुशोभित शुक्रिया। यह फिल्म नहीं देखी हो तो जरूर देखना। मैं इस पर उसी वक्त लिखना चाहता था लेकिन नहीं लिख पाया। उस परजान की शक्ल से मिलते बच्चे को देखा तो यह टिप्पणी एक धक्के की तरह निकल गई। शायदाजी आपका भी आभार, अच्छा लगता है कि अपने किए-धरे पर बिरादरी के लोग नजर रक्खे हुए हैं।
Re: उम्मीद की शक्ल के पीछे छिपी हुई एक और शक्ल
आहट भी एक उम्मीद है, उम्मीद भी एक शक्ल। एक और उम्मीद की शक्ल के पीछे छिपी हुई एक और शक्ल। वाह क्या बात है. अद्भुत गद्य. बधाई.
Re: उम्मीद की शक्ल के पीछे छिपी हुई एक और शक्ल
धन्यवाद, अरुणजी, यह जानकर अच्छा लगता है कि अपना लिखा यार-दोस्त न केवल पढ़ रहे हैं बल्कि रिएक्ट भी कर रहे हैं। ऐसे ही आते रहिएगा।
Re: उम्मीद की शक्ल के पीछे छिपी हुई एक और शक्ल
रवींद्रजी, परजानिया पढ़ी...अपने प्रिय के इतंजार में_ जो खालीपन होता है वहीं हम होते हैं। दोपहर की एक जलती हुई गली से निकलते हैं और पाते हैं सामने लंबी रात का चुप्पा गलियारा खुल गया है। वहाँ राहत देने के लिए कोई चंद्रमा नहीं। सचमुच ही खुद को जलना होता है उजालों के लिए। जलते-जलते न मालूम कब सच में ही जलने का दिन आ जाता है।
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