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14 जून, 2008


ब्लॉग्स (1)
रोजाना की तरह आज सुबह घूमकर आया और लगभग सवा आठ बजे चाय पीते हुए अखबार पढ़ रहा था कि फोन की घंटी बज उठी। उधर मेरे प्रिय कवि चंद्रकांत देवतालेजी की आवाज थी। गले में खराश थी और आवाज में थोड़ी-सी हताशा लेकिन मैं खुश था कि वे इंदौर आए हुए हैं। मैंने कहा मैं ... आगे पढ़ें...