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मैं पूरे वक्त का कवि हूं-चंद्रकांत देवताले

रोजाना की तरह आज सुबह घूमकर आया और लगभग सवा आठ बजे चाय पीते हुए अखबार पढ़ रहा था कि फोन की घंटी बज उठी। उधर मेरे प्रिय कवि चंद्रकांत देवतालेजी की आवाज थी। गले में खराश थी और आवाज में थोड़ी-सी हताशा लेकिन मैं खुश था कि वे इंदौर आए हुए हैं। मैंने कहा मैं शाम को मिलने आता हूं। इधर-उधर की बातें होती रही है और अचानक उन्होंने मुझसे कहा तुम्हारे पास पांच मिनिट हैं और मेरे जवाब का इतंजार किए बगैर कहा-मैं तुमको एक छोटी-सी कविता सुनाता हूं। और उन्होंने मुझे फोन पर यह कविता सुनाई। अब उनकी आवाज में न खराश थी और न ही कोई हताशा। उन्होंने एक कवि के आवेग के साथ मुझे यह कविता सुनाई। मैं उन्हें कई बार कविता पाठ करते हुए सुन चुका हूं और कल्पना कर रहा था कि इस वक्त उनकी क्या भाव मुद्राएं रही होंगी। यह कविता सुनी और मैंने कहा मैं शाम को नहीं, आपसे अभी मिलने आ रहा हूं। उन्होंने कहा मैं ग्यारह बजे तक हूं, उसके बाद शाम को ही मुलाकात हो पाएगी। मैंने कहा मैं दस बजे तक आ रहा हूं।
मैं ठीक दस बजे उनके दरवाजे पर था। उन्होंने मेरे लिए कंटेम्परी सिरीज ऑफ इंडियन आर्ट की अमृता शेरगिल, रामकुमार पर छोटी सी किताब और पेंटिंग्स का एक कैटलॉग निकालकर रखा था। उन्होंने मुझे अपनी एक और नई कविता सुनाई जो इंदौर आते हुए सांवेर के पास उन्होंने लिखी थी। मैं जब भी उनसे मिलता हूं वे हमेशा कवि ही लगे। कवियों, कविता और अपने समय के हाहाकार के बारे में पूरी संलग्नता से बात करते हुए। उनमें कवियों का आत्मविश्वास है। इसीलिए वे कह सके कि वे पूरे वक्त के कवि हैं। उन्होंने मुझसे अपनी कुछ विदेश यात्राअों का जिक्र भी किया और आंग सान सू की को याद किया। मैंने उन्हें बताया कि उदय प्रकाश के ब्लॉग पर जॉन पिल्गर का लिया सू की का बहुत उम्दा इंटरव्यू है। उन्होंने कहा वह मुझे बताना। लिहाजा मैंने इस इंटरव्यू का एक प्रिंट आउट निकाल लिया और शाम को यह उनके हाथों में होगा।
बहरहाल, देवतालेजी की एक लिखित टिप्पणी के साथ उनकी नई कविता आग और पुरानी कविता एक लंबी चीख की तरह आप सबके लिए।

सौ जासूस मरते होंगे तब एक कवि पैदा होता है। मेरे जैसे के भीतर कविता का कारखाना कभी बंद नहीं होता, न अवकाश न हड़ताल। मैं पूरे वक्त का कवि हूं। संकोची इसे बड़बोलापन समझेंगे तो मुझे कोई आपत्ति नहीं। इसका मतलब यह नहीं है कि कविताअों का ढेर लगाता हूं, उत्पाद वाला कारखाना नहीं यह। कविताएं बेहद उधेड़बुन हड़बड़ी में आती हैं। कविता लिखते हुए मैं घिरा हुआ महसूस करता हूं, उस मुसाफिर की तरह जो यादों, सपनों और अपने यथार्थ के जख्मों का असबाब लिए प्लेटफॉर्म छोड़ चुकी ट्रेन पकड़ने दौड़ता है जैसे-तैसे सवार हो जाता है।
सब कुछ को बार-बार कहना जबकि उजागर है चिथड़ा-चिथड़ा होकर चमकते हुए महोत्सव में अजीब लगता है। जैसे अपने जीवनानुभवों की नदी को कविता की नाव में लाद कर ले जाना कठिन है वैसा ही है यह। पर यह भी लेखक की नियति है। सुनता हूं अपने को उत्सवों-गुणगान-कीर्तन के बोगदे में एक लंबी चीख की तरह...


आग

पैदा हुआ जिस आग से
खा जाएगी एक दिन वही मुझको
आग का स्वाद ही तो
कविता, प्रेम, जीवन-संघर्ष समूचा
और मृत्यु का प्रवेश द्वार भी जिस पर लिखा-
मना है रोते हुए प्रवेश करना

मैं एक साथ चाकू और फूल आग का
आग की रोशनी और गंध में
चमकता-महकता-विहंसता हुआ

याद है मुझे कई पुरखे हमारे
जो ताजिंदगी बनकर रहे सुलगती उम्मीदों के प्रवक्ता
मौजूद हैं वे आज भी
कविताअों के थपेड़ों में
आग के स्मारकों की तरह

इन पर लुढ़कता लपटों का पसीना
फेंकता रहता है सवालों की चिंगारियां
बचे-खुचे जिंदा लोगों की तरफ।

एक लंबी चीख की तरह

यहां डाकुअों के मरणोत्तर स्मारक
हत्यारों के जीते जी अभिनंदन
पाखंड का रंगीन उत्सव
और भूख बेबसी के बारे में
धूर्त चेहरों के बेशर्म उद्गार
...चालीस साल का फफोला

फिर भी यहां बुद्धिजीवी खोपड़ियों में
अक्सर चलती धुंधली अटकलबाजियां
कला की खोपड़ी में तैरती ठंडी आजादी
की पता नहीं कैसी गूंगी परछाइयां
डरते-घबराते-शरमाते हैं
चीख से चीखने से चीखते रहने से
शायद आड़े आ जाती है
बटन टूट जाने के भय की भद्रता...

प्रतिक्रियाएँ

Re: मैं पूरे वक्त का कवि हूं-चंद्रकांत देवताले
किसी ने कहा है कि कवि और ऋषि इस धरती का नमक है इनसे ही हमारे दृष्‍टिकोण और हमारी संवेदनाएँ में नए-नए आयाम जुड़ते जाते है। यह रहस्यवादी होते हुए भी हमारे यथार्थ को जगाते है। मैंने महसूस किया हैं कि कवि की कविता से कहीं ज्यादा कवि से मिलाना और उसे सिर्फ देखना और सूनना अपनी वाली नहीं चलाना, तो एक नयी शांति का अनुभव होता है। मैं तो अभी कवि होने की ओर हूँ लेकिन जब भी किसी कवि से मिलता या उनसे फोन पर बात करता हूँ तो मेरे भीतर का कवि भी जागने का प्रयास करने लगता है, कितना जागता है यह तो मालूम नहीं। अंतत: आपने जो लिखा उस पर टिप्पणी करने की मैं हिमाकत नहीं करूँगा।
Re: मैं पूरे वक्त का कवि हूं-चंद्रकांत देवताले
आप संवेदनशील हैं इसलिए इतना अच्छा सोच रहे हैं वरना हमारे हिंदी समाज की हालत तो यह है कि कविता जितना लोगों के लिए मरती-खपती है लोग उससे उतनी ही दूर चले गए है। आपको कवियों से मिलना और उनसे बातें करना अच्छा लगता है तो सच मानिए आपकी ये बातें पढ़कर मुझे भी अच्छा लग रहा है।
Re: मैं पूरे वक्त का कवि हूं-चंद्रकांत देवताले
रवीन्द्र भाई; इस सबसे चर्चित और बहुत पढ़े जाने वाले सुकवि से हमारी भी मुलाक़ात भी तो करवा दी आपने.साधुवाद. उन्होंने जब भी कहा है विलक्षण ही रहा है.वे परिवेश,परिस्थिति और परिदृष्य पर अपनी तीक्ष्ण नज़र रखते हैं और कर्कश हो रहे समय में वह यथार्थ सामने लाते है जिसे हम सब महसूस तो करते हैं लेकिन कह नहीं पाते......बस इसीलिये तो चंद्रकांत देवताले एक समर्थ कवि हैं.
Re: मैं पूरे वक्त का कवि हूं-चंद्रकांत देवताले
आपने बिलकुल ठीक कहा है संजय भाई। वे हिंदी के समर्थ ही नहीं अद्वितीय कवि हैं। हाल ही में संवाद प्रकाशन से उनका नया कविता संग्रह जहां सूर्योदय हो रहा होगा आया है। उसमें उनके लगभग सभी संग्रहों से महत्वपूर्ण कविताएं ली गई हैं। उन कविताअों को पढ़ना हमारे समय के हाहाकार से रूबरू होना है।
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