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यहां पानी चांदनी की तरह चमकता है

कुमार अंबुज कल इंदौर में थे। भोपाल से इंदौर के लिए रवाना होने से पहले उन्होंने फोन कर दिया था कि एक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए आ रहे हैं। तय हुआ कि कार्यक्रम के बाद वे मेरे घर रुकेंगे। वे ठीक पौने नौ बजे मेरे मेरे आफिस आ गए। हम साथ घर आए। थोड़ी देर गपशप के बाद हम रात को लगभग एक घंटा पैदल घूमे। खूब बातें हुई। पुरानी बातें पुराने दिन याद किए। वे जब ९६ में ट्रांसफर होकर इंदौर आए थे तब उनसे गहरी दोस्ती हो गई थी। उस वक्त इंदौर की छोटी सी साहित्यिक दुनिया में हम चार दोस्त वे, मैं, विनीत तिवारी औऱ विवेक गुप्ता खासे चर्चित थे। हम लोगों ने मिलकर हर बुधवार को मिलने-जुलने रचनाएं सुनाने-सुनने का एक सिलसिला शुरू किया था। इसमें कहानीकार-चित्रकार प्रभु जोशी से लेकर ख्यात चित्रकार ईश्वरी रावल, कहानीकार विलास गुप्ते, कवि संदीप श्रोत्रिय से लेकर कुछ युवा कवि तक शामिल थे। वह सिलसिला ज्यादा दिन नहीं चला और उसे बुधवारिया हाट कहकर लोगों ने मजाक बनाया।
खैर। पैदल घूम कर आने के बाद हमने फिर चाय सुड़की और देर रात तक कुमार अंबुज ने फरनांदो पेसोआ की डायरी बुक ऑफ डिसक्वाइट के अंश पढ़कर सुनाए। उन्होंने उस किताब को चितर रखा था। जगह-जगह से। ये अंश सुनकर मैं अजीब ढंग की उदासी से भर गया। इसमें एक जगह पेसोआ लिखते हैं मैं चाइनीज कप पर बनी स्त्री का प्रेमी होना चाहता हूं। मुझे ये पंक्तिया सुनते हुए उनकी अंग्रेजी में पढ़ी कुछ कविताएं याद आती रहीं। मुझे ये अंश पढ़कर उनकी वह कविता याद आई जिसमें कुछ इस तरह के भाव हैं कि मैं जानता हूं कि मैं अकेला हूं और अहसास एक आसमान की मानिंद है जिसमें देखने के लिए कुछ भी नहीं...
बिस्तर पर जाने के बाद देर तक पेसोआ की बातें गुनगुनाती रहीं।
इसके पहले मैंने कुमार अंबुज को विष्णु खरे द्वारा अनूदित चेश्वास मिवोश की कविताएं सुनाईं।
सुबह उठकर हम फिर घूमे और चाय पीते हुए पेंटिंग्स के बहुत सारे कैटलाग देखते रहे। फिर कुमार अंबुज ने मुझे अपनी एक नई और अप्रकाशित कविता सुनाई। आप भी पढि़ए।

यहां पानी चांदनी की तरह चमकता है

आंधियां चलती हैं और मेरी रेत के ढूह
उडकर मीलों दूर फिर से बन जाते हैं यही मेरी अनश्वरता है
यह दिन चट्टान है जिस पर मैं बैठता हूं
प्रतीक्षा और अंधकार। उम्मीद और पश्चाताप।
वासना और कामना। वसंत और जंगल।
मैं हर एक के साथ कुछ देर रहता हूं

शब्द तारों की तरह टूटते हैं वे दिखते हैं अंतरिक्ष में गुम होते हुए चंद्रमा को मैं प्रकट करता हूं किसी ब्लैकहोल में से और इस तरह अपने को संसार में से गुजारता हूं

प्रेम मुझे नष्ट कर चुका है
प्रेम ने ही दिया था मुझे जन्म
प्रेमजन्य यही शरीर है अलौकिक
इसी में खिलते हैं संसार के फूल और झरते हैं
बहती है नीली नदियां और वाष्पित होती हैं
जो मिलती हैं समुद्रों में फिर गिरती है बारिश के साथ
यहीं है उतना निर्जन जो अनिवार्य है सृष्टि के लिए
इसी में कोलाहल है, संगीत है और बिजलियां
पुकार है और चुप्पियां
यहीं है वे पत्थर जिन पर काई जमा होती है

यहीं खुशियां घेर लेती हैं
और एक दिन बदल जाती है बुखार में

यह सूर्यास्त की तसवीर है
देखने वाला इसे सूर्यौदय की भी समझ सकता है प्रेम के वर्तुल हैं सब तरफ
इनका कोई पहला और आखिरी सिरा नहीं
जहां से थाम लो वहीं शुरूआत
जहां छोड़ दो वहीं अंत

रेत की रात के अछ ोर आकाश में ये तारे
चुंबनों की तरह टिमटिमाते हैं
और आकाशगंगा मादक मद्धिम चीख की तरह
इस छोर से उस छोर तक फैली है
रात के अंतिम पहर में यह किस पक्षी की व्याकुलता है
किस कीड़े की किर्र किर्र चीं चट
हर कोई इसी जन्म में अपना प्रेम चाहता है कई बार तो बिल्कुल अभी, ठीक इसी क्षण
आविष्कृत होती हैं इसीलिए सारी चेष्टाएं, संकेत और भाषाएं

चारों तरफ चपल हवा है वानस्पतिक गंध से भरी
यहां पानी चांदनी की तरह चमकता है
और प्यास का वर्तमान पसरा है क्षितिज तक
जो छूट गया, जो दूर है, अलभ्य है जो
वही प्रेम है

जो इसे झूठ समझते हैं
उन्हें अभी कुछ और प्रतीक्षा करना चाहिए।

प्रतिक्रियाएँ

Re: यहां पानी चांदनी की तरह चमकता है
कुमार अंबुज जी को मैंने कविता पाठ करते कई बार सुना है देवास में बहादुर भाई के यहाँ तो इंदौर में साहित्य भवन और जालसभागार में। वैसे पहली दफे इंडियन कॉफी हाउस (गांधी हाल के पास) में पहली दफे उनसे मेरी मुलाकात हुई थी। अब तो विनीत भी मुझे भुल गए होंगे। लेकिन आपने इन सबकी याद दिला दी। जब पुराने समय की याद आती है तो उसके साथ उस काल का मौसम और तमाव वह भावनाएँ याद आ जाती है जो अब हमारा अनुभव बन चुकी है। आपने उनकी कविता पढ़ाकर एक नए अहसास को जगाया इसके लिए धन्यवाद।
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