Welcome, Guest   [ Register | Sign In | Take a tour | Adult Filter: On ]

बादलों को घिरते देखा है

मैं जब भी पानी से भरे बादलों को देखता हूं तो उस पिता की याद आती है जो अभी-अभी अपनी लाड़ली बेटी को विदा करके अपने सूने हो चुके घर के एक वारीन से कोने में अकेला खड़ा है। यह पिता एक बार फिर अपनी बेटी के लिए एक हाथी या एक घोड़ा बनना चाहता है जिस पर बैठकर उसकी बेटी सवारी कर सके। उस बादल को जरा गौर से देखिए, जो अब आपके छज्जे को छूकर निकलने वाला है। वह अपनी बेटी की याद में ही हाथी और घोड़ा बनने की कोशिश कर रहा है। ध्यान से सुनिए, यह गड़गड़ाहट की आवाज नहीं है, उस बादल की आत्मा में अपनी बेटी के साथ बिताए बचपन के दिन उमड़-घुमड़ रहे हैं। और यह बादल जो थोड़ा सी हेकड़ी में, दौड़ लगा रहा है, छोटा भाई है। इसकी चाल पर न जाइएगा। यह बादल हलका लग सकता है लेकिन अंदर से यह भी भरा हुआ है। इसकी बहन ने छह साल तक इसकी चोटी की है। अभी तो यह दौड़ रहा है लेकिन रात में जब थक जाएगा, तब घर के पिछवाड़े या किसी पेड़ की अोट में जाकर बिना आवाज किए सुबकेगा।
और एक दुबला-पतला बादल जो कुछ कुछ उदास-सा यूं ही इधर-उधर टहल रहा है, विदा हो चुकी बहन की छोटी बहन है। यह हमेशा दो चोटियां करती थी और बड़ी बहन हमेशा उसे डांटती हुई कहती थी-एक करा कर। मुझे गूंथने में आलस आती है। इस बादल को देखेंगे तो लगेगा इसके चलने में न सुनाई देने वाली हिचकियां हैं। इन्हीं हिचकियों के कारण इसमें भरे पानी का अंदाजा लगा सकते हैं।
और सबसे आखिर में जो सांवला बादल है वह मां का आंचल है। उसका आंचल कभी न कहे जा सकने वाले दुःख से भारी हो गया है। अभी भी वह अपनी बेटी की यादों में खोया है जिसमें सुख-दुःख की बातें हैं, उलाहना है, प्रेम में कांपता, सिर पर रखा हुआ हाथ है। यह बादल जब भी बरसेगा, इसे बरसता देख बाकी बादल भी बरसेंगे। अपने को कोई भी नहीं रोक पाएगा। सब बरसेंगे।
और ये बरसेंगे तो चारों तरफ जीवन के गीत गूंजेंगे। थोड़ा-सा वक्त निकालकर इन्हें सुनना। ये कहीं और सुनने को न मिलेंगे।

प्रतिक्रियाएँ

Re: बादलों को घिरते देखा है
रवींद्रजी, कनिष्‍क के ब्‍लॉक पर आपने 'ह' को एक पैर पर खड़ी लड़की की तरह देखा और हमें बताया था और हम देर तक वर्णमाला के इस मध्‍यबिंदु को निहारते रह गए थे. अब आपने बादलों की देहभाषा की पूरी की पूरी बारहखड़ी हमें सिखा दी. आपके यहाँ एक लेखक के साथ ही एक चित्रकार के भी ऑब्‍ज़र्वेशंस मिलते हैं. इस लेख में कुछ बिम्‍ब तो इतने सादा आए हैं कि वे हमारे भीतर घर कर जाते हैं और पता भी नहीं चलता. आपने लेख के लिए बाबा नागार्जुन की कविता से शीर्षक दिया है, चलिए इस पर कमेंट भी बाबा की ही कविता से देते हैं- 'कालिदास, सच-सच बतलाना, यक्ष रोया कि तुम रोए थे'
अस्वीकरण