चंद्रकांत देवतालेजी की एक और कविता, आप सबके लिए। यह कविता उनके जल्द ही प्रकाशित होने वाले कविता संग्रह में संग्रहित है।
तुम्हारी हथेलियों पर
बरसों से दुखने का अभिनय करते
मेरे कंधों और पीठ को सहलाती
तुम्हारी हथेलियों पर मैंने क्या रखा?
अगर इस तरह सोचने लगूं तो
मुझे कहीं भी शरण नहीं मिलेगी
आंसुअों में छिपकर भी नहीं
धंसकती हुई रातों और तड़कते हुए दिनों में
तुम खड़ी रही मेरे साथ
और तुमने मुझे गिरने नहीं दिया
दुःख ने झपट्टे मारे हम पर
और हमारे लोगों पर
दुश्मनों ने चाहा हर तरह से मोहताज बनाना
आसपास की दुनिया को
मैं आग में घिर जाता
डूब जाता पानी में
हवा में बिखर जाता
पर तुम आग में पानी, पानी में आग
और हवा में मिट्टी की तरह मुझे थामे रही
तुमने बरदाश्त की मेरी आजादी और मूर्खताएं
उखड़ी पस्त हालत में
तुमने मुझे बच्चे-सा सुलाया
हम फिर गिरे अंधेरे के थक्के टूट कर
पर तुमने बुझने नहीं दी भीतर की मोमबत्ती
तुम चाहती तो बन जाता मैं भी चतुर दुनियादार
शामिल हो जाता कहीं भी मुखौटे खरीदती
भद्रजनों की भीड़ में
पर तुम जतन से पोंछती रही
पतझर और कड़वे दिनों के धब्बे
चमकाती रही पत्तियां, बर्तन और
भीतर की धड़कनों के कोने-कोने
मेरा चेहरा, आंखें, होंठ
मेरे समूचे होने का असह्य हलकापन,
और आग की तरह दहकते शब्द मेरे
बिखर-खो जाते पता नहीं किस गुमनाम इलाके में
जो नहीं होती तुम्हारी
धरती की तरह कड़क-मुलायम हथेलियां

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