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चलो इत्मीनान से हड़बड़ी और शोरगुल के बीच

परसों रात यानी 24 जुलाई को देवतालेजी का फोन आया। उन्होंने कहा मैं दो-तीन दिन से इंदौर में हूं। कल सुबह मिल सकते हो, सुबह नौ बजे। साढ़े नौ-पौने दस बजे तक मैं निकल जाऊंगा। साथ में मार्केज की वह किताब भी ले आना। दूसरे दिन सुबह नौ बजे मैं उनके घर था, मार्केज के नॉवेल मेमोरीज अॉफ माय मेलनकली व्होर्स के साथ। साढ़े नौ बजे उन्हें पीएससी के लिए इंडरव्यू लेने जाना था। वे तैयार हो रहे थे। उन्होंने नीली जींस पर सफेद धारीदार कुरता पहना। कंघा किया और मुझे वागर्थ का नवलेखन आलोचना पर केंद्रित अंक दिखाया। इसमें उनकी एक कविता कुछ बच्चे और बाकी बच्चे पर एक युवा आलोचक पुनेठा की आलोचना प्रकाशित थी। वे खुश थे कि बहुत दूर बैठे एक युवा ने उनकी कविता पर लिखा।
उनके कमरे में चारों अोर किताबें-पत्रिकाएं बिखरी पड़ी थीं। टेबल पर नया ज्ञानोदय का अंक, वागर्थ का वह अंक और उदय प्रकाश की नई किताब रखी हुई थी। सोफे पर कुछ कागज-पत्तर।
मेरी नजर दो चीजों पर गई। एक चे ग्वारा के २००४ के एक कैलेंडर पर औऱ दूसरी उनके दाहिने हाथ के बैंडेज बंधे अंगूठे पर।
मैंने पूछा-काहे कि लगी सर?
उन्होंने मुझसे कहा-तुम्हें ड्रेसिंग करना आता है?
मैं उनके अंगूठे पर लगी बैंडेज निकाली, कॉटन काट कर बेटाडिन का फोहा लगाया और बैंडेज बांध दी। एक छोटी-सी नीली डिबिया में शाम के लिए उनके ही द्वारा दी गई दो गोलियां रखीं। मार्केज नॉवेल, गोली की नीली डिबिया, कुछ कागज उन्होंने अपने नीले बैग में रखे।
अपने खाली कमरे और हर जगह पसरे सन्नाटे के बीच उन्होंने एक वाक्य कहा-मुक्तिबोध अपने आत्मीय जनों को कितना याद करते थे...मैंने सिर्फ गर्दन हिलाई।
फिर जैसे अचानक उन्हें कुछ याद आया हो, सोफे पर पड़े कागज-पत्तरों के बीच उन्होंने एक कागज निकाला और मुझे देते हुए बोले-ये मैंने पहले तुम्हें दिया था क्या?
मैंने देखा वह उनके द्वारा अनूदित एक पादरी की कविता थी। कुछ बरसों पहले यह कविता इंदौर में बड़ी दीदी के नाम से ख्यात रहीं शिक्षाविद् मैत्रेयी पद्मनाभन ने उन्हें दी थी जिसे देवताले ने अनुवाद कर उन्हें लौटा दिया था।
आज बहुत दिनों बाद लौटा हूं और फिर से शुरुआत कर रहा हूं, चंद्रकांत देवताले द्वारा अनूदित इस कविता को देते हुए...यह कविता पढ़ते हुए मुझे निकारागुआ के कवि अर्नेस्तो कार्देनाल के एक गद्यांश और कविताअों की याद आती रही जो बहुत पहले मैंने अशोक वाजपेयी द्वारा संपादित पूर्वग्रह के एक अंक में पढ़ी थी। देवतालेजी के प्रति गहरा आभार प्रकट करते हुए यह कविता आप सबके लिए...

चलो इत्मीनान से हड़बड़ी और शोरगुल के बीच

और याद रखो कि नीरवाता में कैसी शांति होगी
जहां तक संभव हो, बिना झुके सभी से अच्छे रिश्ते रखो
अपना सच, धैर्य और साफगोई से कहो और दूसरों की भी सुनो
सुस्त और अज्ञानी लोगों के पास भी कुछ कहने को अपनी कहानी है
बड़बोले, आक्रामक लोगों से बचो, वे अंतरात्मा को संतप्त करते हैं
तुम दूसरों से अपनी तुलना करोगे तो तुम्हें अहम्मन्यता और कड़वाहट घेर लेगी,
क्योंकि हमेशा तुमसे बेहतर और कमतर लोग रहेंगे ही,
अपनी उपलब्धियों और कामकाज का आनंद लो, चाहे वे कितने ही छोटे हों,
बनते-बिगड़ते वक्त के बीच यही तुम्हारी वास्तविक संपदा है
अपने कामधंधे में सावधानी रखो
क्योंकि दुनिया प्रपंचों से पटी हुई है।
पर इससे ऐसा न हो कि तुम अच्छाइयों के प्रति आंखें मूंद लो
ऊंचे आदर्शों के लिए कई लोग संघर्षरत हैं
और जीवन में सब तरफ उदात्तता झलकती है
जो हो वह रहो और खासतौर पर आत्मीयता का छद्म मत करो।

प्रेम के बारे में निंदा से बचो
क्योंकि सारी बंजरता और मोहभंग के बावजूद
यह घास की तरह चिरस्थायी है।
उम्र के अनुभवों को उदारतापूर्वक ग्रहण करो,
आत्मा की शक्ति को पुष्ट करो जो आकस्मिक आपदा में तुम्हारी रक्षा कर सके
किंतु खुद को खामखयालियों से विपत्तिग्रस्त मत बनाअो
कई भय, अकेलेपन और ऊब से उपजे होते हैं
भरपूर अनुशासन के बावजूद अपने तईं विनम्र रहो
तुम इस ब्रह्मांड के बेटे हो, दरख्तों-सितारों से जरा भी कम नहीं, तुम्हारा हक है यहां
चाहे तुम्हें पता न हो।

निस्संदेह सृष्टि जैसा कि होना है अनेक तरह से अपने को प्रकट करेगी
इसलिए ईश्वर के साथ शांति से रहो, उसे चाहे जिस रूप में तुम मानो
और जिंदगी के शोरगुल भरे संदेहों में (तुम्हारे उद्यम और प्रेरणाएं, जो भी जैसी हों)
अपनी आत्मा को शांत रखो।
अपने तमाम पाखंड, शुष्कता और खंडित सपनों के साथ
अब भी यह दुनिया सुंदर है।
चौकस रहते प्रसन्न रहने की
कोशिश करो, कोशिश करो।

(अोल्ड सेंट पाल चर्च वाल्टीमोर से अंग्रेजी में प्राप्त, सन् 1692)
अंग्रेजी से अनूदित ः चंद्रकांत देवताले

प्रतिक्रियाएँ

Re: चलो इत्मीनान से हड़बड़ी और शोरगुल के बीच
रवींद्रजी, तक़रीबन सालभर पहले जुलाई की ही कोई दोपहर रही होगी, उज्‍जैन में, हरे पेड़ों के परदे वाले अपने आंगन में देवताले सर ने मुझे यह कविता दी थी. 'इस कविता का मैंने अनुवाद किया है, मुझे अनुवाद में ख़ासी मेहनत करना पड़ी, तुम इसे देखो, मैं अभी आता हूं'. और मैं देखता हूं काग़ज़ पर- ओल्‍ड सेंट पॉल चर्च बाल्‍टीमोर के किसी बेनाम पादरी की पंक्तियां- अपने मिजाज़ और गढ़न में ख्रीस्‍त के 'सर्मन ऑन द माउंट', ख़लील जिबान के 'प्रॉफ़ेट' और एक्विनास-एकहार्ट के उपदेशों जैसा कुछ. मैं वह पूरी इबारत पढ़ जाता हूं. सर लौटते हैं तो मैं उनसे पूछता हूं- आप और किसी चर्च के पादरी के सर्मन्‍स का तर्जुमा. वे कहते हैं- तो क्‍या हुआ. वे मुझे यह बताना भूल जाते हैं कि उनकी तालीम क्रिश्चियन कॉलेज में हुई है और उन्‍होंने रतलाम के फ़ादर शेलप्‍पा पर एक कविता भी लिखी है. यह सब तो ख़ैर बाद में पता चलता रहा, लेकिन वह पढ़ जाने के बाद मैं- एक एथीस्‍ट- उनसे कहता हूं- आस्‍था करना कितना अच्‍छा होता है न. वे सोचते हुए-से सिर हिला देते हैं. यह सब याद आ रहा है, जब आज पूरे सालभर बाद यह समूचा टैक्‍स्‍ट फिर से देखा. हालांकि इस दरमियान पूरे वक्‍़त मुझे कहीं न कहीं इसकी याद बनी रही थी. आज सुबह ही अपने भीतर इसकी एक पंक्ति दोहरा र‍हा था- 'दुनिया में हमेशा ही तुमसे बेहतर और कमतर लोग होंगे, याद रखो.' और वह पंक्ति- 'अपने तमाम बंजरपन और मोहभंग के बावजूद प्रेम घास की तरह चिरस्‍थायी है'- हां, यह असीम सौंदर्य से भरा लयपूर्ण शांत गद्य है, अनुभव की आंच में पका हुआ और आत्‍मीय. ख़ास यह कि सर्मन्‍स होने के बावजूद इसमें कमांडमेंट्स जैसी चीज़ नहीं. यहां कहीं भी हिदायतों के नाख़ून नहीं गड़ते. ये सर्मन हमें ज्‍़यादा ज़हीन, शरीफ़ और ख़ामोश बनाते हैं. सूत्रों-सूक्तियों जैसी इन सतरों से गुज़रते हुए हम धीरे-धीरे और समझदार, और 'सयाने' होते हैं और ये सादे फ़लसफ़े हमें बड़ी सरलता से अपने भीतर 'सेट' कर देते हैं.
Re: चलो इत्मीनान से हड़बड़ी और शोरगुल के बीच
प्रिय सुशोभित, तुमने ठीक ही लक्षित किया है। मुझे खुशी इस बात की है कि तुम्हें इस के बहाने देवताले के साथ बिताई यादें फिर हरी हो गईं। सचमुच आभार।
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