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रोती हुई मां रोते बच्चे को दूध पिला रही है

मैं गहरी नींद में था, स्वप्न देखता हुआ। उसमें किसी स्त्री के रोने की दबी दबी-सी आवाज थी। बीच-बीच में वह रूदन हिचकी में बदल जाता। टूटती सांसों के बीच रूदन की आवाज गूंजती थी। उसी रूदन से लिपटी हुई एक छोटे बच्चे के रोने की आवाज भी थी। यह रोना इस कदर घुला-मिला था कि लगता कोई एक ही गले से रो रहा है।
जैसे नाभि-नाल का रिश्ता हो।
मुझे उसका चेहरा ठीक से याद नहीं, बस उसके रोने की आवाज याद है। एक बदरंग होती दीवार से पीठ टिकाए वह स्त्री रो रही थी और उसके पास कोई नहीं था।
एक कमरा था जो बहुत सारी अड़ंग-बड़ंग चीजों से भरा था और उसमें एक कोने में बमुश्किल एक स्त्री के बैठने की जगह निकली थी। वहीं, वह रो रही थी।
वह लगातार रो रही थी। उस रोने की आवाज के पीछे अचानक मुझे मां की आवाज सुनाई दी। मैंने ध्यान से सुनने की कोशिश की।
मां मुझे पुकार रही थी।
मां की आवाज इतनी धीमी और टूटी हुई थी कि मुझे लगा वह मुझे बहुत दूर से पुकार रही है।
मुझे लगा कोई मुझे झिंझोड़ रहा है और मेरी नींद टूट गई।
मैंने आंखें खोली तो पाया मां मुझे आवाज देकर जगा रही है। मैंने मां का चेहरा देखा। उसके चेहरे पर अलग-अलग गतियों से आंसू बह रह थे। एक के पीछे एक। दूसरे में मिलकर चुपचाप गिरते हुए।
मुझे लगा मैं स्वप्न ही देख रहा हूं। जो स्त्री कमरे के कोने में पीठ टिकाए अकेली रो रही थी उसका चेहरा धुंधला था।
मैंने आँखें मलीं और मां को फिर से देखा।
मां रो रही थी। कह रही थी मोहिनी ने आत्महत्या कर ली।
घर के पिछवाड़े कुछ स्त्रियों के रोने की आवाज आ रही थी। मैं उठा और मुंह धोने के लिए जैसे ही आंगन में आया, मेरी नजर नीम के पेड़ पर गई। नीले कच्च आसमान में नीम धूप में चमक रहा था। हवा चलती तो एक लय में बंधी सरसराहट के बीच कुछ पत्तियां टूटकर गिरने लगतीं। रोने की आवाज सरसराहट में अजीब तरह से मिलकर उन टूटती पत्तियों के साथ चुपचाप गिर रही थी। रोने की आवाज बिलकुल पेड़ की पत्तियों से छनकर आ रही थी।
एक पल के लिए मुझे लगा कि स्त्रियां पेड़ में बैठी रो रही हैं।
हवा में पेड़ हिलता तो रूदन टूटता हुआ लगता, जैसे बीच में कोई सांस ले रहा है।
पेड़ से पत्तियों का झरना और रोना जारी था।
अचानक मुझे बच्चे के रोने की आवाज सुनाई दी। मैंने देखा मोहिनी की बड़ी बहन अपने बच्चे को गोद में लिए बैठी है। उसकी आंखे लाल और सूजी हुई हैं। बच्चा पूरी ताकत से रो रहा था। उसे भूख लगी थी। बच्चे की मुट्ठियां तनी हुई थीं और रोने से उसका चेहरा लाल हो चुका था। वह मुंह खुला रखे और सिर हिलाते हुए मां का स्तन ढूंढ़ रहा था। उसकी मां ने एक पांव हिलाते हुए दूध पिलाना शुरू किया। बच्चा भूखा था, तुरंत चुप होकर मुंह लगाकर, हिलाने लगा।
स्त्रियों का रोना फिर शुरू हो गया है। दूर शहर से कोई आया है। एक स्त्री ट्रेन की तरह धड़धड़ाती हुई आती है और मोहिनी का मां की गोद में सिर पटक कर रोने लगती है। दूसरी स्त्रियां भी रोने लगती हैं।
घर में कानाफूसी का दौर जारी है...बाहर हलचल बढ़ गई है। कोई कहता है जल्दी ले चलो भई। स्त्रियों के रोने की आवाज तेज हो गई है। इन आवाजों में अब बच्चे के रोने की आवाज भी शामिल है।
बच्चे की मां के रोने से बच्चे के मुंह से स्तन छूट गया है। वह रोने लगता है तो मां अपना घुटना हिलाते हुए, रोते हुए उसे फिर से दूध पिलाने लगती है।
हम बाहर आ चुके हैं। शवयात्रा शुरू हो चुकी है, स्त्रियों के रोने की आवाजें पीछे-पीछे चली आई हैं। मैं मुड़कर देखता हूं। बहुत सारी रोती हुई स्त्रियों के बीच मुझे वह स्त्री भी दिखती है जिसकी गोद में बच्चा आसपास होती हचलचों को अजीब नजरों से देख रहा है। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा है कि हो क्या रहा है।
बच्चा अपनी रोती मां का चेहरा देखता है और खुद भी रोने लगता है।
सब कुछ निपट चुका।
मैं घर पर हूं। मां ने नहलाने के लिए पानी गरम कर दिया है। अब मैं रसोई घर में हूं।
मुझे भूख लग रही है। मां गरम-गरम रोटियां उतार रही है।
मां गरम रोटी पर घी चुपड़कर थाली में रख रही है। मैं उसका चेहरा देखता हूं। मां की आंख में आंसू हैं। मैं चौंक पड़ता हूं।
मां का चेहरा और उस स्त्री का चेहरा एक जैसा है जो रोते हुए अपना घुटना हिलाते, रोते बच्चे को दूध पिला रही थी।
पेंटिंगः गुस्ताव क्लिम्ट

प्रतिक्रियाएँ

Re: रोती हुई मां रोते बच्चे को दूध पिला रही है
यह फैंटेसी की धोखादेह तकनीक की एक बेहतरीन बानगी है. आपके इस पीस के लिए दो स्‍तरों से अप्रोच की जा सकती है- एक अप्रोच तो सब्‍जेक्टिव होगी, जो आपकी तरफ़ से चलकर आएगी और निहायत पर्सनल होगी, उस सब्‍जेक्टिविटी को साधना हर किसी के लिए मुश्किल ही होगा. इसे गुज़रने वालों के सामने ऑब्‍जेक्टिविटी की दीवार पर चढ़कर उसमें साझा कर सकना सरल होगा (क्‍योंकि गुस्‍ताव क्लिम्‍ट की चित्रभाषा सार्वभौमिक और सार्वलौकिक है). ऑब्‍जेक्टिवली कहूँ, तो यह एक बेहद सर्रियल चीज़ है. अवचेतन में अवगाहन करती अतियथार्थवादी संरचना, जिसके लिए हमें भाषा की दहलीज़ से उतरकर सबकॉन्‍शस के दर्रों में जाना होता है- और फिर वहाँ- रोटी, भूख, रुदन, दूध, आंसू और विलाप के बिम्‍ब और पर्सेप्‍शंस जाने-पहचाने लगने लगते हैं. मैं बार-बार ख़ुद को दोहराना चाहूँगा-यह इतना पर्सनल पीस है कि इस पर कमेंट जैसी कोई चीज़ संभव नहीं हो सकती, लेकिन उसकी अंतर्वस्‍तु न सही, उसके रूपाकार पर ज़रूर कुछ बातें हो सकती हैं. यह आपकी चिर-परिचित शैली में लिखी गई चीज़ है, हालाँकि यह सर्वाधिक मार्मिक भी है. आपके यहाँ अतियथार्थवाद, जादुई यथार्थवाद, मिथक-चेतना, सादृश्‍यता, नैरेटिव्‍स, लिरिसिज्‍़म और चित्रकारी के गुण घुल-मिल जाते हैं. फंतासी के स्‍तर पर लगातार चैलेंज करता-सा ऐसा सघन और संगुम्फित गद्य हमने इधर कम ही देखा. 'रोती हुई माँ दूध पिला रही है'- एक अद्भुत दृश्‍य-चित्र है, 'नहाते हुए रोती औरत' से भी ज्‍़यादह- कम्‍पेशनेट और पैथॉस में भीगा हुआ. पेड़ के भीतर बैठकर रोती औरतों जैसा. यह नाभि-नाल की वेदना है. 'रुदन की आवाज़ थी, लेकिन चेहरा ठीक से याद नहीं' और 'दूर की पुकार सरीखी धीमी-टूटी हुई आवाज़' जैसे डिटेल्‍स हॉन्‍ट करते हैं और वह तंद्रिल परिवेश बुनते हैं, जो आपकी शैली और ख़ास तौर पर आपके इस पीस के लिए वांछित था. ब्‍लॉग पर आपकी ताज़ा कविताओं की इंतज़ारी बरक़रार है.
Re: रोती हुई मां रोते बच्चे को दूध पिला रही है
सुशोभित किन शब्दों में आभार व्यक्त करूं? तुमने बहुत संवेदनशील ढंग से उस मर्म को पकड़ने की कोशिश की है। सचमुच शुक्रिया।
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