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वैन गॉग का एक खत


गुलजार

तारपीन तेल में कुछ घोली हुई धूप की डलियां
मैंने कैनवास में बिखेरी थीं मगर
क्या करूं लोगों को उस धूप में रंग दिखते ही नहीं!

मुझसे कहता था थियो चर्च की सर्विस कर लूं
और उस गिरजे की खिदमत में गुजारूं
मैं शबोरोज जहां-
रात को साया समझते हैं सभी,
दिन को सराबों का सफर!
उनको माद्दे की हकीकत तो नजर आती नहीं
मेरी तस्वीरों को कहते हैं, तखय्युल है
ये सब वाहमा हैं!

मेरे कैनवास पे बने पेड़ की तफसील तो देखो
मेरी तखलीक खुदाबंद के उस पेड़ से
कुछ कम तो नहीं है!
उसने तो बीज को एक हुक्म दिया था शायद,
पेड़ उस बीज की ही कोख में था,
और नुमायां भी हुआ
जब कोई टहनी झुकी, पत्ता गिरा, रंग अगर जर्द हुआ
उस मुसव्विर ने कहीं दखल दिया था,
जो हुआ, सो हुआ-

मैंने हर शाख पे, पत्तों के रंग-रूप पे मेहनत की है,
उस हकीकत को बयां करने में
जो हुस्ने हकीकत है असल में

उन दरख्तों का ये संभला हुआ कद तो देखो
कैसे खुद्दार हैं ये पेड़, मगर कोई भी मगरूर नहीं
इनको शेरों की तरह किया मैंने किया है मौजूं!
देखों तांबे की तरह कैसे दहकते हैं खिजां के पत्ते,

कोयला खदानों में झौंके हुए मजदूरों की शक्लें
लालटेनें हैं, जो शब देर तलक जलतीं रहीं
आलुअों पर जो गुजर करते हैं कुछ लोग-पोटेटो ईटर्स
एक बत्ती के तले, एक ही हाले में बंधे लगते हैं सारे!

मैंने देखा था हवा खेतों से जब भाग रही थी
अपने कैनवास पे उसे रोक लिया-
रोलां वह चिट्ठीरसां
और वो स्कूल में पढ़ता लड़का
जर्द खातुन पड़ोसन थी मेरी-
फानी लोगों को तगय्यर से बचा कर उन्हें
कैनवास पे तवारीख की उम्रें दी हैं-!

सालहा साल ये तस्वीरें बनाई मैंने
मेरे नक्काद मगर बोल नहीं-
उनकी खामोशी खटकती थी मेरे कानों में,
उस पे तस्वीर बनाते हुए इक कव्वे की वह चीख-पुकार
कव्वा खिड़की पे नहीं, सीधा मेरे कान पे आ बैठता था,
कान ही काट दिया है मैंने!

मेरे पैलेट पे रखी धूप तो अब सूख चुकी है,
तारपीन तेल में जो घोला था सूरज मैंने,
आसमां उसका बिछाने के लिए-
चंद बालिश्त का कैनवास भी मेरे पास नहीं है!

मैं यहां रेमी में हूं
सेंटरेमी के दवाखाने में थोड़ी-सी
मरम्मत के लिए भर्ती हुआ हूं!
उनका कहना है कई पुर्जे मेरे जहन के अब ठीक नहीं हैं-
मुझे लगता है वो पहले से सवातेज हैं अब!

(गॉग की ख्यात पेंटिंग Tree and Man (in front of the Asylum of Saint-Paul, St. Rémy )

प्रतिक्रियाएँ

Re: वैन गॉग का एक खत
वैनगॉग और गुलज़ार को एक साथ देखना रोमांचक है. गुलज़ार की यह नज्‍़म उनकी नज्‍़मों के मज़मुए 'रात पश्‍मीने की' में शामिल है और इसे उनकी उन लंबी नज्‍़मों की कड़ी में रखा जा सकता है, जिसमें उन्‍होंने ख्रीस्‍त, गौतम और प्रेमचंद से भी इसी तरह अपने ख़ास अंदाज़ में गुफ़्तगूं की है. कोई चाहे तो इन सबकी एक शानदार सीरिज़ भी तैयार कर सकता है. गुलज़ार की यह नज्‍़म भी आला दर्जे की है और आसमान का कॅनवास, धूप की डलियां, लालटेनों जैसे चेहरे, पेड़ों के संभले हुए क़द, साये की मानिंद रातें और सराबों के सफ़र जैसे दिन कुछ ऐसी बेहतरीन इमेजेज़ हैं, जो हमें केवल और केवल गुलज़ार के यहां ही मिल सकती हैं. अब वक्‍़त आन पहुँचा है कि मीरो-ग़ालिब, साहिर, कैफ़ी, फ़राज़, फ़ैज़, इक़बाल, अदम, मजाज़ और फि़राक की ही तरह हिंदी अदब वाले गुलज़ार को भी एक अज़ीम शाइर की मानिंद क़बूल करें. अनिता वर्मा की कविता और गुलज़ार की नज्‍़म वैनगॉग तक पहुँचने के दो अलग-अलग रास्‍ते हैं. एक दूसरा लंबा रास्‍ता इरविंग स्‍टोन ने तय किया है और इसके पड़ावों पर वैनगॉग की चिट्ठियां बिखरी पड़ी हैं... 'थियो, तस्‍वीरें बनाने से भी बेहतर है बच्‍चों को जनम देना या खेतों में काम करना' वैनगॉग की इस चिट्ठी के साथ मुझे याद आ रहा है. नज्‍़म के साथ लगाई गई तस्‍वीर को मैं ग़ौर से देख रहा हूं. यह चांद रोशनी में भीगा हुआ बैंजनी रात का वैसा ही मंज़र है, जिसकी क्राफ़्टमैनशिप के बारे में आप मुझे पहले भी बताए थे. इस मिड शॉट को देखते हुए मुझे आपकी वह सीख भी याद आ रही है, जिसके मुताबिक- एक अच्‍छी तस्‍वीर हमें हमारी जगह बताती है कि हम कहाँ से देख रहे हैं. वैनगॉग और गुलज़ार को हमें आंकने दीजिए, जबकि हम उनकी ओर आंसुओं भरी चमकती हुई आंखों से ताक रहे हैं. अपनी ब्‍लॉग-मशगूलियत बरक़रार रखियेगा.
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