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तब से वह अपने पीले हाथों को सबसे छिपाए फिरती है
वह इससे बेखबर थी। न तारीख पता, न वार, न ये पता था कि दिन था या शाम। या अपने में ही गहराती कोई रात। धूप थी कि छांव। वह सोयी थी या जागी। जीवन में थी या स्वप्न में। पता नहीं, कोई एक खयाल कब उसके पास आकर हौले से बैठ गया। पहली नजर में उसने ध्यान नहीं दिया। जब ...
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Ravindra Vyas
द्वारा 25 अक्टूबर, 2008 11:00 AM पर पोस्टेड
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बाहर फैलते पतझड़ से बेखबर
उसे पता नहीं था कि वह कब से वहीं खड़ी रह गई है, जहां वह उसे छोड़कर चला गया था। वह पतझड़ के मौसम में खड़ी थी और उसके हाथों में जो छुअन बाकी रह गई थी वह उसके अंदर एक भरे-पूरे वसंत में खिलकर महक रही थी। इसी महकते वसंत की लचकती शाख पर वह अपने प्रेम का अधखिला ...
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Ravindra Vyas
द्वारा 21 अक्टूबर, 2008 1:24 PM पर पोस्टेड
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एक दिन मां बिना कुछ कहे कहीं चली गई
सुबह जब उठे तो हमें किसी ने नहीं देखा। फिर एक पेड़ हिला, उस पर चिडि़या बैठी, एक फूल झरा।एक गाय आई, एक कुत्ता।इनको भी किसी ने नहीं देखा।रात की रोटी दूसरे दिन दोपहर तक सूखती रही। बिल्ली दूध पीकर चली गई। मैं बारिश में भीगता हूं। छींकता हूं। मुझे भी कोई नहीं ...
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Ravindra Vyas
द्वारा 8 अक्टूबर, 2008 5:21 PM पर पोस्टेड
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