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एक दिन मां बिना कुछ कहे कहीं चली गई

सुबह जब उठे तो हमें किसी ने नहीं देखा।
फिर एक पेड़ हिला, उस पर चिडि़या बैठी, एक फूल झरा।
एक गाय आई, एक कुत्ता।
इनको भी किसी ने नहीं देखा।
रात की रोटी दूसरे दिन दोपहर तक सूखती रही।
बिल्ली दूध पीकर चली गई।

मैं बारिश में भीगता हूं।
छींकता हूं।
मुझे भी कोई नहीं देखता।
मैंने मां को ढूंढ़ा।
वह जहां सोयी थी वहां बच्चे अकेले हैं।

और हमारे सिरहाने ठंडे पानी की मटकी रखी हुई थी।

प्रतिक्रियाएँ

Re: एक दिन मां बिना कुछ कहे कहीं चली गई
भावनाएँ बहुत है व्‍यक्‍त करने के लिए, पर शब्‍द साथ नहीं दे पा रहें है, बस यही कहने को बचा है कि माँ कभी कहीं नहीं जाती, वो मिट्टी में मिल भी जाएँ तो भी अपने बच्‍चों के तन से कवच की तरह चिपक जाती है। धन्‍यवाद....
Re: एक दिन मां बिना कुछ कहे कहीं चली गई
आपके प्रति गहरा आभार प्रकट करता हूं।
Re: एक दिन मां बिना कुछ कहे कहीं चली गई
रवीन्द्र जी, आपकी रचनाओ में अनूठी-मर्मस्पशी झाँकियाँ है!. इन भावभीनी रचनाओं के लिये बधाई! संध्या गुप्ता
Re: एक दिन मां बिना कुछ कहे कहीं चली गई
संध्याजी, शुक्रिया।
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