वह पतझड़ के मौसम में खड़ी थी और उसके हाथों में जो छुअन बाकी रह गई थी वह उसके अंदर एक भरे-पूरे वसंत में खिलकर महक रही थी। इसी महकते वसंत की लचकती शाख पर वह अपने प्रेम का अधखिला फूल देख रही थी। वह उसके खिलने की आहट को सुनने के लिए बेताब थी। पतझड़ का कब से एक अटका पत्ता झरता हुआ उसके पैरों के पास आकर ठहर जाता है।
वापसी की राह को तकती उसकी आंखों में अब भी हरापन बाकी बचा था।
उसे अहसास नहीं था कि इसी हरेपन की रगड़ से उसके भीतर कुछ छिल जाएगा, छिन जाएगा, जिसकी जलन देर तक बनी रहेगी...
वह अब भी वहीं खड़ी है।
अपने वसंत के साथ, अधखिले फूल की आहट को सुनने को बेताब।
बाहर फैलते पतझड़ से बेखबर...
(जैक वैट्रीआनो की पेंटिंग- रोज़)
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