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बाहर फैलते पतझड़ से बेखबर


उसे पता नहीं था कि वह कब से वहीं खड़ी रह गई है, जहां वह उसे छोड़कर चला गया था।
वह पतझड़ के मौसम में खड़ी थी और उसके हाथों में जो छुअन बाकी रह गई थी वह उसके अंदर एक भरे-पूरे वसंत में खिलकर महक रही थी। इसी महकते वसंत की लचकती शाख पर वह अपने प्रेम का अधखिला फूल देख रही थी। वह उसके खिलने की आहट को सुनने के लिए बेताब थी। पतझड़ का कब से एक अटका पत्ता झरता हुआ उसके पैरों के पास आकर ठहर जाता है।
वापसी की राह को तकती उसकी आंखों में अब भी हरापन बाकी बचा था।
उसे अहसास नहीं था कि इसी हरेपन की रगड़ से उसके भीतर कुछ छिल जाएगा, छिन जाएगा, जिसकी जलन देर तक बनी रहेगी...
वह अब भी वहीं खड़ी है।
अपने वसंत के साथ, अधखिले फूल की आहट को सुनने को बेताब।
बाहर फैलते पतझड़ से बेखबर...
(जैक वैट्रीआनो की पेंटिंग- रोज़)

प्रतिक्रियाएँ

Re: बाहर फैलते पतझड़ से बेखबर
इस लेख में मज़ा नही आया.
Re: बाहर फैलते पतझड़ से बेखबर
जो वस्तु हमारी सोच के स्तर से ऊपर होती है अकसर उसमें रस नहीं आता इसका मतलब यह नहीं होता कि उसमें कोई रस नहीं ....... बाकी आप अपने विचार प्रकट करने के लिए स्वतंत्र है रविंद्रजी, इस नायाब कृति के लिए आपको एक बार फिर बधाई !!!!
Re: बाहर फैलते पतझड़ से बेखबर
रविन्द्र जी,बधाई खुबसूरतख्याल के लिए,इसका जवाब साइमन जे आर्तिज़ ने जो की एक एकोमा जन जाती के थे और पुशकार्ट पुरुस्कार से सम्मानित , ने बखूबी दिया है हलकी ढलान से जहाँ अभी भी गर्मी है,निहारता हूँ तुम्हे तुम्हारे कंधे से लगा, बंद है मेरी आँखें ,मैं अनुभव कर सकता हूँ अपने गाल पर ,तुम्हारे लहू की थपकी,अपने मन के भीतर,
Re: बाहर फैलते पतझड़ से बेखबर
मुझे खुशी है कि वो बाहर फैलते पतझड़ से बेखबर है. और अपने वसंत में स्थित है.
Re: बाहर फैलते पतझड़ से बेखबर
मैं सभी के प्रति गहरा आभार प्रकट करता हूं।
अस्वीकरण