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तब से वह अपने पीले हाथों को सबसे छिपाए फिरती है

वह इससे बेखबर थी।

न तारीख पता, न वार, न ये पता था कि दिन था या शाम। या अपने में ही गहराती कोई रात। धूप थी कि छांव। वह सोयी थी या जागी। जीवन में थी या स्वप्न में।
पता नहीं, कोई एक खयाल कब उसके पास आकर हौले से बैठ गया। पहली नजर में उसने ध्यान नहीं दिया। जब दोबारा वह खयाल अपनी जगह से उठकर उसके आसपास मंडराने लगा तो उसने महूसस किया कि इसमें कुछ झीनापन है जिसके पार देखा जा सकता है। रोज के इतने काम थे कि वह इस झीनेपन में ठीक से देख नहीं पाई। फिर इस झीनेपन पर कुछ रंग आने लगे। फिर खुशबू। उसे लगा इस रंगो-बू को समझने की कोशिश करे। वह समझती इसके पहले ही यह झीनापन एक तितली में बदल गया।
पहले एक तितली।
फिर दूसरी तितली।
फिर तीसरी।
फिर तीसवीं।
उसे लगा वह तितलियों से घिरी है। उसके चारों तरफ तितलियां ही तितलियां मंडरा रही हैं। खूब सारी तितलियां। रंगबिरंगी। इन्हीं तितलियों में गुम उसे लगा वह किसी दूसरे संसार की प्राणी है। वह उन तितलियों के रंगों में गुम थी। वह जमीन पर ही थी लेकिन अपने कदमों को रखते हुए वह चलती तो उसे लगता वह एक फूल से दूसरे फूल पर हौले-हौले कदम रख रही है।
वह इतनी खुश थी कि वह हमेशा अपनी आंखें बंद रखती। उसे लगता उसके चेहरे पर भी तितलियां उतर रही हैं। वह अपने चेहरे पर धीरे से हाथ फेरती। उसे लगता उसके हाथों में कुछ धड़क रहा है। वह धीरे-धीरे अपनी ही धड़कनों को सुनते हुए हाथ खोलती और पाती कि उसके दोनों हथेलियां एक बड़े फूल की पीली पंखुरियों में बदल गई हैं। उसके हाथों में पीला रंग महक रहा है, जैसे किसी ने बड़े प्यार से गीत गाते हुए हल्दी लगाई हो। उसे लगा यह कोई जादू है। उसे जादू में यकीन था।

उसने पीला रंग देखा। वह खुश रंग था। लेकिन उसने सोचा उसके हाथ पीले देखकर लोग सवाल करेंगे। उसने सोचा पानी से हाथ धो ले तो यह रंग छूट जाएगा। लेकिन उसने देखा पानी में रगड़-रगड़कर हाथ धोने के बाद भी पीला रंग छूट नहीं रहा। फिर उसने साबुन लगाकर हाथ धोए। वहां अब भी पीला चमक रहा था। उसने कपड़े के साबुन से हाथ धोए। वहां पीला रंग ही दमक रहा था। उसने सोचा कैरोसिन ट्राई किया जाए। फिर सोचा मि्टटी।
लेकिन उसके हाथ हमेशा के लिए पीले हो चुके थे।
तब से वह अपने पीले हाथों को सबसे छिपाए फिरती है।
(पेंटिंग ः रवींद्र व्यास)

प्रतिक्रियाएँ

Re: तब से वह अपने पीले हाथों को सबसे छिपाए फिरती है
सच कहा आपने उसे जादू में यकीन है ....... और सिर्फ पीला ही नहीं गुलाबी, बैंगनी, लाल, सिंदूरी ....... सारे रंग उसी के हैं ..... और सारी खूशबुएँ भी.... इस लेख के जरिए एक रंग और भर दिया आपने उसके जीवन में ...... धन्यवाद
Re: तब से वह अपने पीले हाथों को सबसे छिपाए फिरती है
बेहतरीन रचना
Re: तब से वह अपने पीले हाथों को सबसे छिपाए फिरती है
bahut acche keep it up.
Re: तब से वह अपने पीले हाथों को सबसे छिपाए फिरती है
हाथ जब एक बार पीले हों जाते है तो उसका पीलापन जाता नहीं है.... और आप चाह के भी न उसको छुपा सकते हों ना मिटा सकते हो
Re: तब से वह अपने पीले हाथों को सबसे छिपाए फिरती है
शैफालीजी आप ने सच कहा। इसके लिए शुक्रिया। और आदर्शजी यह कहानी आपको पसंद आई, आपने कमेंट किया इसके लिए आभार। नेहाजी, इस उत्साहवर्धन के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद। दीप्तिजी आप ठीक कहती हैं, यह पीला रंग होती ही ऐसा है। सभी के प्रति आभार। रवींद्र व्यास
Re: तब से वह अपने पीले हाथों को सबसे छिपाए फिरती है
कभी -कभी जब पीला रंग बहुत-बहुत चाह कर भी हथेलियों पर लगने से कतराता है तो यकीन मानिए मन करता है सारी दुनिया से यह रंग मिट जाए पर जब उम्मीद की लौ टिमटिमाती है और वह भी 'पीली' होती है तो इसी रंग से मोहब्बत हो जाती है। हथेली शर्माने लगती है। एक चिरकुवाँरी
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