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एक बार तुमसे प्रेम कहूंगा

एक बार खिलता फूल कहूंगा
एक बार जिगर में अंगारा
एक बार गहराती रात कहूंगा
एक बार झिलमिल तारा

एक बार खिलता फूल कहूंगा
एक बार जिगर में अंगारा
एक बार गहराती रात कहूंगा
एक बार झिलमिल तारा

एक बार जागा सपना कहूंगा
एक बार हाथ में लकीर
एक बार धुनी रमाता कहूंगा
एक बार गाता फकीर

एक बार दर दर भटका कहूंगा
एक बार मिला कमंडल
एक बार ये है चिमटा कहूंगा
एक बार अलख निरंजन।

एक बार तुमसे प्रेम कहूंगा
एक बार टपका आंसू
एक बार पहाड़ काटूंगा कहूंगा
एक बार नदी में झांकूं
पेंटिंग ः मार्क शागाल

प्रतिक्रियाएँ

Re: एक बार तुमसे प्रेम कहूंगा
ek prem shabd hi to hai jo sunkar,padhkar khushi milti hai....ek baar pahaad kaatunga,ek baar nadi main jhakungaa....behad sundar....badhai.
Re: एक बार तुमसे प्रेम कहूंगा
वाह! सुंदर पंक्तियाँ.... मोनिका भट्ट
Re: एक बार तुमसे प्रेम कहूंगा
मगर सब टिकते कहाँ हैं! करवट के कोण बदलते ही, ख़याल, यादें, तजुर्बे, सब के सब बदल जाते हैं. bahut achha likha hai.
Re: एक बार तुमसे प्रेम कहूंगा
सोंच जरूर रहे हैं रवीन्द्र जी, पर कह नहीं पाएँगे!
Re: एक बार तुमसे प्रेम कहूंगा
रुके नहीं कोई यहाँ, नामी हों कि अनाम
कोई जाये सुबह को, कोई जाए शाम
Re: एक बार तुमसे प्रेम कहूंगा
अभिव्यक्ति का खूबसूरत अंदाज !
अस्वीकरण