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इति जैसा शब्द

हेमन्त शेष की कविता

नर्म और सुगंधमयी कोंपलों की तरह
फूट आती हैं नीली
कांपती हुई इच्छाएं
अनसुने दृश्यों और अनदेखी आवाज़ों के स्वागत में
प्रेम खोल देता है आत्मा की बंद खिड़की

वहां बिलकुल शब्दहीन
अोस से भरी हवाएं प्रवेश कर सकती हैं

देह की दीर्घा की हर चीज़
भीगी और मृदुल जान पड़ती है

बेचैन हाथों से
मृत्यु और काल का प्राचीन फाटक खोलकर
पूरी पृथ्वी पर बचे दो लोग आचमन के लिए
अलौकिक रोशनी से भरे तालाब की तरफ़ आते हैं

भय और आशंका की असंख्य लहरें गड्‍डमड्ड कर देती हैं स्पर्शों के बिम्ब

सिर्फ़ रात के आकाश की कलाई पर गुदा हुआ मिलता है
स्थायी हरा चंद्रमा
जिसके हर गुलाबी पत्थर पर लिखा वे
एक-दूसरे का नाम देखते हैं

वहां से झीने आलोक में डूब दिन उन्हें
जहाज़ों की तरह तैरते नज़र आते हैं
अनन्त दूरियां और विस्तारों तक जिन्हें ले जाते हैं आकांक्षा के पंख

शरीर में जागे हुए करोड़ों फूलों और
कुहरे में झिलमिलाते हुए जुगनूअों जैसी
मौलिक लिपि में
प्रेमीगण बार-बार लिखते हैं
संसार की सबसे प्राचीन त्रासद पटकथा

वे जिसकी बस
कांपती हुई नीली शुरूआत जानते हैं


इति जैसा कोई शब्द
प्रेम के शब्दकोश में नहीं होता।

(कवि के प्रति गहरा आभार प्रकट करते हुए और इस कविता के साथ अपनी पेंटिंग लगाकर कृतज्ञ महसूस करते हुए)

प्रतिक्रियाएँ

Re: इति जैसा शब्द
बहुत सुंदर. कविता भी और पेंटिंग भी.
Re: इति जैसा शब्द
चैन हाथों से मृत्यु और काल का प्राचीन फाटक खोलकर पूरी पृथ्वी पर बचे दो लोग आचमन के लिए अलौकिक रोशनी से भरे तालाब की तरफ़ आते हैं भय और आशंका की असंख्य लहरें गड्‍डमड्ड कर देती हैं स्पर्शों के बिम्ब सिर्फ़ रात के आकाश की कलाई पर गुदा हुआ मिलता है स्थायी हरा चंद्रमा जिसके हर गुलाबी पत्थर पर लिखा वे एक-दूसरे का नाम देखते हैं बहुत खूबसूरत ओर पेंटिंग भी उतनी ही लाजावाब !
Re: इति जैसा शब्द
प्रेम खोल देता है आत्मा की खिड़की,...प्रेम की इति नही होती पंक्तियाँ भाव और लयको गति देती हैं ..आपकी बारिश की दूसरी कड़ी मैंपहला कमेन्ट गलती से एनोमयास हो गया है आज देखा ,आपका जवाब भी है
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