मुझे औरत की अंगुलियों के बारे में पता है
ये अंगुलियां समुद्र की लहरों से निकलकर आती हैं
और एक थके-मांदे पस्त आदमी को
हरे-भरे दरख्त में बदल देती है
जिसे तुम त्वचा कहते हो वह नदी का वसंत है
चांदनी में बहता हुआ इच्छाओं का झरना
उसे समय को परे धकेल कर
जगह की गहराइयों में ले जाना खूब आता है
फिर भी सिर्फ एक औरत को समझने के लिए
हजार साल की जिंदगी चाहिए मुझको
क्योंकि औरत सिर्फ भाप या वसंत ही नहीं है
एक सिंफनी भी है पूरे ब्रह्मांड की
जिसका दूध दूब पर दौड़ते हुए बच्चों में
खरगोश की तरह कुलांचे भरता है
और कंदरा भी है किसी अज्ञात इलाके में
जिसमें उसकी शोकमग्न परछाईं
दर्पण पर छाई गर्द को रगड़ती रहती है।
(ख्यात कवि चंद्रकांत देवताले की कविता स्त्री के साथ की कुछ पंक्तियां)
पेंटिंग : रवीन्द्र व्यास
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