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9 अप्रैल, 2009


ब्लॉग्स (1)
कुमार अंबुज की कवितायहां पानी चांदनी की तरह चमकता हैआंधियां चलती हैं और मेरी रेत के ढूह उड़कर मीलों दूर फिर से बन जाते हैं यह मेरी अनश्वरता है यह दिन की चट्टान है जिस पर मैं बैठता हूंप्रतीक्षा और अंधकार। उम्मीद और पश्चातापवासना और दिसंबर। वसंत और धुआं मैं ... आगे पढ़ें...