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पलाश-सेमल के फूल और रंगात्मक प्रतिरोध

उनके चित्रों में वे सेमल और पलाश के चटख फूल रूपायित हो रहे हैं जो उन्होंने अपने बचपन में कभी गांव में देखे थे। ये फूल उनके कैनवास पर बोल्ड स्ट्रोक्स और गहरे रंगों में खिलकर लोगों को आकर्षित कर रहे हैं। यही नहीं उन्होंने बांग्ला लेखिका तस्लीमा नसरीन के पक्ष में अपने रंगात्मक प्रतिरोध को अभिव्यक्ति दी है। अपने गहरे रंगों के कैनवास लेकर मनोज कचंगल फिर प्रस्तुत हैं। फाइन आर्ट कॉलेज इंदौर के स्टूडेंट रहे युवा चित्रकार पर एक बड़ी किताब डोअर्स आफ परसेप्शन भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन से छपकर आई है। इसका संपादन देश की ख्यात कला समीक्षक रत्नोत्तमा सेनगुप्ता ने किया है। इसी शीर्षक से उन पर एक डाक्युमेंट्री फिल्म भी बन चुकी है जिसे प्रेवश भारद्वाज ने निर्दैशित किया है और विषय विशेषज्ञ के रूप में ख्यात कवि-कला समीक्षक विनोद भारद्वाज ने योग दिया है।
मनोज ने फाइन आर्ट कॉलेज इंदौर से 2001 में बीएफ किया और 2003 में एमएफए किया। वे कुछ सालों तक इंदौर में ही चित्रकारी करते रहे और पिछले पांच-छह सालों से नोएडा में बस गए हैं। वे पहले क्षैतिज ब्रश स्ट्रोक्स लगाकर अपने कैनवास पर सुंदर भू-दृश्य रचते थे। अक्सर हलके रंगों को पतला करते हुए वे परत-दर-परत इस्तेमाल करते थे। यानी एक्रिलिक रंगों को वे लगभग वाटर कलर्स की तरह वापरते थे और एक के ऊपर एक सतहें रचते हुए उन्हें टोनल इफेक्ट्स देते थे। कैनवास के नीचे की सतह को अक्सर गहरे रंगों और फिर हल्के रंगों के साथ ऊपर बढ़ते हुए जमीन-आसमान एक कर देते हैं। और इस तरह तैयार होते थे उनके खूबसूरत लैंडस्केप। अब उनमें बदलाव आया है और अब रंगों की क्षैतिज सतह पर उनके बोल्ड स्ट्रोक्स या रंगों के बड़े बड़े पैचेस दिखाई देते हैं।
नईदुनिया से खास बातचीत में वे कहते हैं कि बचपन में मुझे पलाश के चटख रंग खींचते थे। मैंने उन्हें देखते कभी अघाया नहीं। वे मेरे अवचेतन में कहीं गहरे बसे हुए थे। अब वही पलाश और सेमल के फूल मेरे कैनवास पर कलानुभव में रूपांतरित हो रहे हैं। इंदौर में चित्रकारी की बारिकियां सीखते हुए मैंने मांडू और आसपास की जगहों के लैंडस्केप किए हैं और प्रकृति मुझे मोहित करती है। मांडू को लेकर तो मैंने एक पूरी सिरीज ही की थी- सिम्फनी आफ रूइंस। इसे लेकर मैंने बनारस में एकल नुमाइश की थी जिसे सराहा गया था। इसके बाद मैंने रंगों को धीरे-धीरे जानना शुरू किया, उनकी एकदूसरे के साथ संगति को समझा और फिर मैंने एक और सिरीज की-सिम्फनी आफ कलर्स। तो चटख रंगों की इस यात्रा में मेरा यह पड़ाव है जिसमें मैंने पूरी ताकत के साथ लाल-नीले-पीले रंगों का कल्पनाशील इस्तेमाल किया है। मैं वान गाग के रंगों और रंग लगाने के उनके तरीकों से बेहत प्रभावित रहा हूं। मैंने अपने नए चित्रों में रंगों को लगाने का नया ढंग सीखा है। उन्होंने तो बांग्ला लेखिका तस्लीमा नसरीन को भारत में पनाह नहीं देने के विरोध में भी पेंटिग की है। वे कहते हैं इस घटना से मैं इतना विचलित था कि मैंने लाल रंगों के बोल्ड स्ट्रोक्स से इसका रंगात्मक प्रतिरोध किया। मेरे ये चित्र इस नई प्रदर्शनी में शामिल हैं।
रजा पुरस्कार प्राप्त मनोज कहते हैं कि मुझ पर किताब छपना और डाक्युमेंट्री फिल्म बनना एक तरह से ईश्वर की कृपा है। इससे मुझे हिम्मत मिली है कि मैं और बेहतर काम कर सकूं। डाक्युमेंट्री की कुछ शूटिंग इंदौर के फाइन आर्ट कॉलेज, छावनी, रेलवे स्टेशन, मांडू में हुई है। कुछ हिस्सा दिल्ली और कोलकाता की आर्ट गैलरीज में शूट किया गया है जहां मेरी एक्जीबिशन थी। इसके अलावा मेरे स्टुडियो में मुझे काम करते हुए और बातचीत करते हुए दिखाया गया है।
किताब डोअर्स आफ परसेप्शन में मनोज का इंटरव्यू, देश के नामचीन समीक्षकों की समीक्षाएं, उनके बचपन से लेकर अब तक के चुनिंदा फोटो, उनके शुरूआती से लेकर नए काम शामिल किए गए हैं। इसमें उनकी डाक्युमेंट्री के बार में एक संक्षिप्त राइट अप है।
उनका मानना है कि मंदी आने से कलाकारों को कोई फर्क नहीं पड़ा। फर्क पड़ा है तो उन गैलरियों को जो मुनाफा कमाने के लिए धड़ाधड़ खुल गई थीं। फर्क पड़ा है तो उन कलाकारों को जो सिर्फ पैसा कमाने के लिए कला के इलाके में आए थे। जो अच्छे कलाकार हैं वे पहले भी बिक रहे थे और मंदी के इस दौर में भी बिक रहे हैं। लेकिन मंदी से अब कला बाजार भी थोड़ा साफ होगा और यह नए सिरे से उभरेगा। और यह भी कि अब असल कलाकार ही टिक सकेंगे।
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