सुबह जब उठे तो हमें किसी ने नहीं देखा। फिर एक पेड़ हिला, उस पर चिडि़या बैठी, एक फूल झरा।एक गाय आई, एक कुत्ता।इनको भी किसी ने नहीं देखा।रात की रोटी दूसरे दिन दोपहर तक सूखती रही। बिल्ली दूध पीकर चली गई। मैं बारिश में भीगता हूं। छींकता हूं। मुझे भी कोई नहीं ... आगे पढ़ें...
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 अपनी कोई महीन बात को कहने के लिए गुलज़ार अक्सर कुदरत का कोई हसीन दृश्य चुनते हैं। कोई दिलकश दृश्य खींचते हैं, बनाते हैं। कोई एक दृश्य जिसमें पहाड़ है, कोहरा है, दरिया है या पेड़ या फिर धुँध में लिपटा कोई ख़ूबसूरत नजारा। उनकी नज्म किसी बिम्ब या दृश्य से ... आगे पढ़ें...
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 समकालीन हिंदी कविता के महत्वपूर्ण कवि कुमार अंबुज भी ब्लॉगर बन गए हैं। आज ही उन्होंने अपनी एक बेहतरीन पोस्ट डाली है। यह उनके गद्य का एक टुकड़ा है, शहर को देखने की उनकी अपनी नितांत नाजुक निगाह और शैली। इसे पढ़कर यह सहज ही अंदाज लगाया जा सकता है कि यह एक ... आगे पढ़ें...
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इस वक्त वह रसोईघर में खड़ी-खड़ीखिड़की से देख रही है बारिशआप उसकी गुनगुनाहट को सुन नहीं सकतेबारिश उसमें शामिल होकर उसे एक मीठे झरने में बदल रही हैहरे पत्तों के बीच जो पक्षी दुबका बैठा है वह उसे टुकुर टुकुर देखता हैवह अब धीरे-धीरे हंस रही हैऔर उसके गाल पर ... आगे पढ़ें...
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 गुलजार तारपीन तेल में कुछ घोली हुई धूप की डलियांमैंने कैनवास में बिखेरी थीं मगरक्या करूं लोगों को उस धूप में रंग दिखते ही नहीं!मुझसे कहता था थियो चर्च की सर्विस कर लूंऔर उस गिरजे की खिदमत में गुजारूंमैं शबोरोज जहां-रात को साया समझते हैं सभी, दिन को सराबों ... आगे पढ़ें...
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मैं गहरी नींद में था, स्वप्न देखता हुआ। उसमें किसी स्त्री के रोने की दबी दबी-सी आवाज थी। बीच-बीच में वह रूदन हिचकी में बदल जाता। टूटती सांसों के बीच रूदन की आवाज गूंजती थी। उसी रूदन से लिपटी हुई एक छोटे बच्चे के रोने की आवाज भी थी। यह रोना इस कदर ... आगे पढ़ें...
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 आज सुबह से बारिश विलंबित खयाल में थी। कभी द्रुत भी लेकिन देर तक विलंबित।बादल एक लय में तैर रहे हैं। पानी से भरे हुए। जहां मन होता है, बसरते हैं। पेड़ एक पैर पर खड़े होकर नाचते हैं। एक पेड़ किसी खयाल में खड़ा भीग रहा है। चुपचाप। लगता है, किसी इंतजार में ... आगे पढ़ें...
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परसों रात यानी 24 जुलाई को देवतालेजी का फोन आया। उन्होंने कहा मैं दो-तीन दिन से इंदौर में हूं। कल सुबह मिल सकते हो, सुबह नौ बजे। साढ़े नौ-पौने दस बजे तक मैं निकल जाऊंगा। साथ में मार्केज की वह किताब भी ले आना। दूसरे दिन सुबह नौ बजे मैं उनके घर था, मार्केज ... आगे पढ़ें...
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 दुनिया में करोड़ों लोग यूं ही फुटबॉल के दीवाने नहीं हो गए हैं। खिलाड़ी इसके लिए जीते हैं और मरते हैं। आंसू बहाते हैं और सीना फुलाते हैं। जो हारते हैं उन्हें ४० हजार लोगों से भरे खचाखच स्टेडियम में रोने में कतई शर्म नहीं आती क्योंकि वे जानते हैं कि ... आगे पढ़ें...
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चंद्रकांत देवतालेजी की एक और कविता, आप सबके लिए। यह कविता उनके जल्द ही प्रकाशित होने वाले कविता संग्रह में संग्रहित है। तुम्हारी हथेलियों पर बरसों से दुखने का अभिनय करते मेरे कंधों और पीठ को सहलाती तुम्हारी हथेलियों पर मैंने क्या रखा? अगर इस तरह सोचने ... आगे पढ़ें...
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 मै जब भी पानी से भरे बादलों को देखता हूं तो उस पिता की याद आती है जो अभी-अभी अपनी लाड़ली बेटी को विदा करके अपने सूने हो चुके घर के एक वारीन से कोने में अकेला खड़ा है। यह पिता एक बार फिर अपनी बेटी के लिए एक हाथी या एक घोड़ा बनना चाहता है जिस पर बैठकर उसकी ... आगे पढ़ें...
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 मैं जब भी पानी से भरे बादलों को देखता हूं तो उस पिता की याद आती है जो अभी-अभी अपनी लाड़ली बेटी को विदा करके अपने सूने हो चुके घर के एक वारीन से कोने में अकेला खड़ा है। यह पिता एक बार फिर अपनी बेटी के लिए एक हाथी या एक घोड़ा बनना चाहता है जिस पर बैठकर उसकी ... आगे पढ़ें...
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कुमार अंबुज कल इंदौर में थे। भोपाल से इंदौर के लिए रवाना होने से पहले उन्होंने फोन कर दिया था कि एक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए आ रहे हैं। तय हुआ कि कार्यक्रम के बाद वे मेरे घर रुकेंगे। वे ठीक पौने नौ बजे मेरे मेरे आफिस आ गए। हम साथ घर आए। थोड़ी देर ... आगे पढ़ें...
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रोजाना की तरह आज सुबह घूमकर आया और लगभग सवा आठ बजे चाय पीते हुए अखबार पढ़ रहा था कि फोन की घंटी बज उठी। उधर मेरे प्रिय कवि चंद्रकांत देवतालेजी की आवाज थी। गले में खराश थी और आवाज में थोड़ी-सी हताशा लेकिन मैं खुश था कि वे इंदौर आए हुए हैं। मैंने कहा मैं ... आगे पढ़ें...
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 समय चुपचाप करवट लेकर उनकी अभी अभी आई झुर्री में छिप गया है। वहां न धूप है, न छाया। आंधी में उड़ चुके हरेपन की हलकी रगड़ बाकी रह गई है। आगे पढ़ें...
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