 बरसों पहले इंदौर के एक टॉकीज के चुभते पटियों पर बैठकर मैंने मर्लिन मुनरो की फिल्म देखी थी औऱ मेरा यकीन करिये की उसकी जान लेवा अदाअों और बला की खूबसूरती को टकटकी बांधे देखते हुए मैं किसी बादल पर सवार था। आगे पढ़ें...
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 उसने महसूस किया उसके सीने के बाईं अोर कहीं उस चुन्नी का पीला रंग छूट गया है जो धडकनों के साथ मिलकर छोटे-छोटे पीले फूलों में खिल गया है। आगे पढ़ें...
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 यदि इन सचाइयों से भागना ही आपके लिए जीना है तो फिर आप सच को कभी नहीं देख पाएंगे... आगे पढ़ें...
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उसकी कमीज पर शहर की रगड़ के निशान देखे हैं और उसी कमीज पर पहाड़ की छुअन का थोड़ा सा हरापन, आगे पढ़ें...
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उनके नाजुक खयालों और जज्बात की तितली आपके दिल पर हौले से बैठकर ऐसे उड़ जाती है कि उसके रोशन-रंगीन रंग हमेशा के लिए आपके दिलो-दिमाग में जगमगाते रहते हैं औऱ अपनी खूशबू से महकाए रहते हैं। आगे पढ़ें...
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 हुसैन आज भी अनेक युवा चित्रकारों से ज्यादा चित्र बनाते हैं। बेचने के लिए नहीं बल्कि अपनी रचनात्मक ऊर्जा को सहेजते-संवारते हुए। आगे पढ़ें...
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दोस्तों, मैं नहीं जानता ईश्वर है कि नहीं, लेकिन मैं हमेशा प्रार्थना करता रहूंगा उन तमाम बच्चों के लिए जो किसी भी काम से किसी भी कारण अपने घर से निकलते हैं वे वापस अपने घर लौट आएं। आगे पढ़ें...
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किशन महाराज का तबला इन सबसे विशिष्ट हुआ तो इसलिए कि अपनी निजता की रक्षा करता हुआ वह ज्यादा सामाजिक हुआ। आगे पढ़ें...
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...और आज खुशबू का करोड़ों का कारोबार है, जिंदगी से पसीने की गंध को बेदखल करता हुआ। आगे पढ़ें...
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जो चीयर लीडर्स के हिलते नितंबों पर फिदा हैं उन्हें वे मुबारक, मैं आज गिलहरी के कुचलकर मर जाने को खबर बनाता हूं। आगे पढ़ें...
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मैं आशुतोष की कविताओं पर शुरुआत से ही फिदा रहा हूं। इसलिए नहीं कि वह दोस्त है बल्कि इसलिए कि हिंदी की ढेर औसत दर्जे की कविताअों के बीच उसकी कविताएं यह गहरी आश्वस्ति देती हैं कि अच्छे कवियों का पुनर्जन्म होता रहता है। उसकी कविताएं गहरे अवसाद के रेशों से बने और बुने गए झीने पर्दे की कविताएं हैं जिसमें करूणा का जल एक अोझल होती नदी की तरह दूर से झिममिलाता रहता है। आगे पढ़ें...
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यह समझना मुश्किल कि इतनी जबरदस्त रचनात्मक ऊर्जा एक ऐसी लड़की में कैसे है जो बालों का रंग हर रोज बदलती रहती है, कल काला, आज लाल और फिर कल हरा। आगे पढ़ें...
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बहुत दिनों बाद अपनी पुरानी पुस्तकों और पत्रिकाअों को टटोल रहा था तो हाथ लगा कवि-आलोचक अशोक वाजपेयी द्वारा संपादित पूर्वग्रह का वह खास अंक जो कवियों के गद्य पर एकाग्र है। इसमें आखिर में मेरे प्रिय कवि केदारनाथ सिंह का एक उम्दा गद्य प्रकाशित है- एक स्तम्भ का अकेलापन। पूर्वग्रह के प्रति आभार मानते हुए इसे पढ़िए और कवि के गद्य का आनंद लीजिए। इसमें पकती हुई जमीन की खुशबू मिलेगी। आगे पढ़ें...
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मैं एक बार फिर शकीरा की ओर लौटा हूं। ३१ साल की जवानी में उसका जलवा इतना जानदार है कि वह जब थिरकती है तो लगता है एक कौंध मचलती-उछलती नाच रही है। उसकी थिरकन में बदन की बल खाती बिजलियां एक लपट की तरह आपको लपकने की कोशिश करती लगती हैं। उसका नाच एक अंतहीन आंच का आगोश है। उसकी आवाज आबशार की तरह आपको ठंडी राहत देती है तो कभी अंगारे की आंच का अहसास भी कराती है। आगे पढ़ें...
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पिछले दिनों पाकिस्तान के नामवर शायर जीशान साहिल गुजर गए। अलग तरह के लबो-लहजे में शायरी करने वाले इस शायर को कराची पर लिखी उसकी नज्मों ने हर सू मशहूर कर दिया। तब उसकी उन नज्मों पर भी लोगों की नजर पड़ी, जिनसे हम-आपके सरोकार भी जुड़े हैं। आगे पढ़ें...
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