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बारिश में विदा
आज सुबह से बारिश विलंबित खयाल में थी। कभी द्रुत भी लेकिन देर तक विलंबित।बादल एक लय में तैर रहे हैं। पानी से भरे हुए। जहां मन होता है, बसरते हैं। पेड़ एक पैर पर खड़े होकर नाचते हैं। एक पेड़ किसी खयाल में खड़ा भीग रहा है। चुपचाप। लगता है, किसी इंतजार में ...
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Ravindra Vyas
द्वारा 19 अगस्त, 2008 1:24 PM पर पोस्टेड
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चलो इत्मीनान से हड़बड़ी और शोरगुल के बीच
परसों रात यानी 24 जुलाई को देवतालेजी का फोन आया। उन्होंने कहा मैं दो-तीन दिन से इंदौर में हूं। कल सुबह मिल सकते हो, सुबह नौ बजे। साढ़े नौ-पौने दस बजे तक मैं निकल जाऊंगा। साथ में मार्केज की वह किताब भी ले आना। दूसरे दिन सुबह नौ बजे मैं उनके घर था, मार्केज ...
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Ravindra Vyas
द्वारा 26 जुलाई, 2008 5:38 PM पर पोस्टेड
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शूटआउट एट विएनावाला
दुनिया में करोड़ों लोग यूं ही फुटबॉल के दीवाने नहीं हो गए हैं। खिलाड़ी इसके लिए जीते हैं और मरते हैं। आंसू बहाते हैं और सीना फुलाते हैं। जो हारते हैं उन्हें ४० हजार लोगों से भरे खचाखच स्टेडियम में रोने में कतई शर्म नहीं आती क्योंकि वे जानते हैं कि ...
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Ravindra Vyas
द्वारा 23 जून, 2008 10:46 AM पर पोस्टेड
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तुम्हारी हथेलियों पर
चंद्रकांत देवतालेजी की एक और कविता, आप सबके लिए। यह कविता उनके जल्द ही प्रकाशित होने वाले कविता संग्रह में संग्रहित है। तुम्हारी हथेलियों पर बरसों से दुखने का अभिनय करते मेरे कंधों और पीठ को सहलाती तुम्हारी हथेलियों पर मैंने क्या रखा? अगर इस तरह सोचने ...
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Ravindra Vyas
द्वारा 19 जून, 2008 2:17 PM पर पोस्टेड
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बादलों को घिरते देखा है
मै जब भी पानी से भरे बादलों को देखता हूं तो उस पिता की याद आती है जो अभी-अभी अपनी लाड़ली बेटी को विदा करके अपने सूने हो चुके घर के एक वारीन से कोने में अकेला खड़ा है। यह पिता एक बार फिर अपनी बेटी के लिए एक हाथी या एक घोड़ा बनना चाहता है जिस पर बैठकर उसकी ...
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Ravindra Vyas
द्वारा 18 जून, 2008 2:31 PM पर पोस्टेड
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बादलों को घिरते देखा है
मैं जब भी पानी से भरे बादलों को देखता हूं तो उस पिता की याद आती है जो अभी-अभी अपनी लाड़ली बेटी को विदा करके अपने सूने हो चुके घर के एक वारीन से कोने में अकेला खड़ा है। यह पिता एक बार फिर अपनी बेटी के लिए एक हाथी या एक घोड़ा बनना चाहता है जिस पर बैठकर उसकी ...
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Ravindra Vyas
द्वारा 18 जून, 2008 2:31 PM पर पोस्टेड
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यहां पानी चांदनी की तरह चमकता है
कुमार अंबुज कल इंदौर में थे। भोपाल से इंदौर के लिए रवाना होने से पहले उन्होंने फोन कर दिया था कि एक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए आ रहे हैं। तय हुआ कि कार्यक्रम के बाद वे मेरे घर रुकेंगे। वे ठीक पौने नौ बजे मेरे मेरे आफिस आ गए। हम साथ घर आए। थोड़ी देर ...
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Ravindra Vyas
द्वारा 17 जून, 2008 5:40 PM पर पोस्टेड
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मैं पूरे वक्त का कवि हूं-चंद्रकांत देवताले
रोजाना की तरह आज सुबह घूमकर आया और लगभग सवा आठ बजे चाय पीते हुए अखबार पढ़ रहा था कि फोन की घंटी बज उठी। उधर मेरे प्रिय कवि चंद्रकांत देवतालेजी की आवाज थी। गले में खराश थी और आवाज में थोड़ी-सी हताशा लेकिन मैं खुश था कि वे इंदौर आए हुए हैं। मैंने कहा मैं ...
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Ravindra Vyas
द्वारा 14 जून, 2008 2:29 PM पर पोस्टेड
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सातवीं सीढ़ी और पीले फूल
उसने महसूस किया उसके सीने के बाईं अोर कहीं उस चुन्नी का पीला रंग छूट गया है जो धडकनों के साथ मिलकर छोटे-छोटे पीले फूलों में खिल गया है।
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Ravindra Vyas
द्वारा 23 मई, 2008 2:48 PM पर पोस्टेड
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मैंने नंगी आंखों से जीवन की जघन्यता को देखा है
यदि इन सचाइयों से भागना ही आपके लिए जीना है तो फिर आप सच को कभी नहीं देख पाएंगे...
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Ravindra Vyas
द्वारा 20 मई, 2008 11:25 AM पर पोस्टेड
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आज मेरे प्रिय कवि मंगलेश डबराल का जन्मदिन है
उसकी कमीज पर शहर की रगड़ के निशान देखे हैं और उसी कमीज पर पहाड़ की छुअन का थोड़ा सा हरापन,
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Ravindra Vyas
द्वारा 16 मई, 2008 12:48 PM पर पोस्टेड
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तमाम शोखी, तमाम बिजली, तमाम मस्ती, तमाम जादू
उनके नाजुक खयालों और जज्बात की तितली आपके दिल पर हौले से बैठकर ऐसे उड़ जाती है कि उसके रोशन-रंगीन रंग हमेशा के लिए आपके दिलो-दिमाग में जगमगाते रहते हैं औऱ अपनी खूशबू से महकाए रहते हैं।
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Ravindra Vyas
द्वारा 12 मई, 2008 12:45 PM पर पोस्टेड
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अब वे अपने विश्व में रहते हैं
हुसैन आज भी अनेक युवा चित्रकारों से ज्यादा चित्र बनाते हैं। बेचने के लिए नहीं बल्कि अपनी रचनात्मक ऊर्जा को सहेजते-संवारते हुए।
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Ravindra Vyas
द्वारा 10 मई, 2008 1:17 PM पर पोस्टेड
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रोज घर से निकलो और रोज घर पहुंच जाअो बच्चों
दोस्तों, मैं नहीं जानता ईश्वर है कि नहीं, लेकिन मैं हमेशा प्रार्थना करता रहूंगा उन तमाम बच्चों के लिए जो किसी भी काम से किसी भी कारण अपने घर से निकलते हैं वे वापस अपने घर लौट आएं।
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Ravindra Vyas
द्वारा 8 मई, 2008 12:30 PM पर पोस्टेड
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किशन महाराज और तबले पर कुछ नोट्स
किशन महाराज का तबला इन सबसे विशिष्ट हुआ तो इसलिए कि अपनी निजता की रक्षा करता हुआ वह ज्यादा सामाजिक हुआ।
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Ravindra Vyas
द्वारा 6 मई, 2008 2:19 PM पर पोस्टेड
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