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चैनल: सिनेमा साहित्य-कला ...


ब्लॉग्स (11)
अचानक बारिश तेज होने लगती है लेकिन मैं बारिश की परवाह किए बिना धीरे-धीरे चलने लगता हूं। मैं देखता हूं लोग भागते हैं और सिर छिपाने की जगह ढूंढ लेते हैं। कोई चाय के टपरे के नीचे या घने पेड़ के नीचे शरण लेता है। कोई आड़ ढूंढ़ लेता है, कोई छाते के नीचे बुला ... आगे पढ़ें...

बाहर पानी भरी सड़क पर इक्का -दुक्का वाहनों की आवाज़ें आती । बीच-बीच में नेपाली की सीटी की आवाज़ गूंजती सुनाई पड़ती और उसमें कुत्ते के भौंकने की आवाज अजब तरह से मिल जाती। कोई एक हे राम कहता हुआ निकल जाता। पेड़ों की सरसराहट से लगता बारिश बीच-बीच में तेज़ हो ... आगे पढ़ें...

बारिश की कई आवाज़ें मेरी स्मृति में बजती रहती हैं। नदी और झरने की नहीं, सिर्फ बारिश की आवाज़। और बारिशों की इतनी आवाज़ें थीं कि जब बारिश नहीं हो रही होती है तब भी मुझे बारिश की आवाज़ सुनाई देती रहती है। जैसे ही मां हम भाई-बहनों को आवाज़ लगाती, मुझे लगता ... आगे पढ़ें...

इस वक्त वह रसोईघर में खड़ी-खड़ीखिड़की से देख रही है बारिशआप उसकी गुनगुनाहट को सुन नहीं सकतेबारिश उसमें शामिल होकर उसे एक मीठे झरने में बदल रही हैहरे पत्तों के बीच जो पक्षी दुबका बैठा है वह उसे टुकुर टुकुर देखता हैवह अब धीरे-धीरे हंस रही हैऔर उसके गाल पर ... आगे पढ़ें...

गुलजार तारपीन तेल में कुछ घोली हुई धूप की डलियांमैंने कैनवास में बिखेरी थीं मगरक्या करूं लोगों को उस धूप में रंग दिखते ही नहीं!मुझसे कहता था थियो चर्च की सर्विस कर लूंऔर उस गिरजे की खिदमत में गुजारूंमैं शबोरोज जहां-रात को साया समझते हैं सभी, दिन को सराबों ... आगे पढ़ें...

समय चुपचाप करवट लेकर उनकी अभी अभी आई झुर्री में छिप गया है। वहां न धूप है, न छाया। आंधी में उड़ चुके हरेपन की हलकी रगड़ बाकी रह गई है। आगे पढ़ें...

यह समझना मुश्किल कि इतनी जबरदस्त रचनात्मक ऊर्जा एक ऐसी लड़की में कैसे है जो बालों का रंग हर रोज बदलती रहती है, कल काला, आज लाल और फिर कल हरा। आगे पढ़ें...

बहुत दिनों बाद अपनी पुरानी पुस्तकों और पत्रिकाअों को टटोल रहा था तो हाथ लगा कवि-आलोचक अशोक वाजपेयी द्वारा संपादित पूर्वग्रह का वह खास अंक जो कवियों के गद्य पर एकाग्र है। इसमें आखिर में मेरे प्रिय कवि केदारनाथ सिंह का एक उम्दा गद्य प्रकाशित है- एक स्तम्भ का अकेलापन। पूर्वग्रह के प्रति आभार मानते हुए इसे पढ़िए और कवि के गद्य का आनंद लीजिए। इसमें पकती हुई जमीन की खुशबू मिलेगी। आगे पढ़ें...

मैं एक बार फिर शकीरा की ओर लौटा हूं। ३१ साल की जवानी में उसका जलवा इतना जानदार है कि वह जब थिरकती है तो लगता है एक कौंध मचलती-उछलती नाच रही है। उसकी थिरकन में बदन की बल खाती बिजलियां एक लपट की तरह आपको लपकने की कोशिश करती लगती हैं। उसका नाच एक अंतहीन आंच का आगोश है। उसकी आवाज आबशार की तरह आपको ठंडी राहत देती है तो कभी अंगारे की आंच का अहसास भी कराती है। आगे पढ़ें...

स्पैनिश चित्रकार सल्वाडोर डाली ने अपने समय और समाज की विडंबनाअों और विद्रूपताअों के साथ ही अपने भीतर के संसार के स्वप्न, आकांक्षाअों और विशाद को बहुत ही कलात्मक कौशल के साथ चित्रित किया है। आगे पढ़ें...

प्रेरणा के लिए मैं सपनों को बहुत महत्व देता हूं लेकिन बाद मैंने महसूस किया कि जीवन खुद प्रेरणा के लिए एक महान स्रोत है और सपना उसका बहुत ही छोटा-सा हिस्सा। लेखन के बारे में यह बात बिलकुल सच है कि मैं सपनों की विभिन्न धारणाअों और उनकी व्याख्याअों में बहुत दिलचस्पी रखता हूं और इन्हें जीवन का हिस्सा मानता हूं लेकिन यथार्थ उससे कहीं अधिक बड़ी चीज है। मेरे स्वप्न शायद बहुत अच्छे नहीं होते। आगे पढ़ें...