 मुंबई में आतंकवादी हमले के घेरे में सौ से ज्यादा लोगों के मरने की खबरें और इस घेरे में घायलों की गूँजती चीखें इस घेरे का व्यास और मारकता ज्यादा बढ़ाती हैं। इस पागलपन का असर कहाँ तक गया है, इसका अंदाजा शायद राजनीतिज्ञों, अर्थशास्त्रियो, समाजशास्त्रियों, ... आगे पढ़ें...
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 हेमन्त शेष की कवितानर्म और सुगंधमयी कोंपलों की तरहफूट आती हैं नीलीकांपती हुई इच्छाएंअनसुने दृश्यों और अनदेखी आवाज़ों के स्वागत मेंप्रेम खोल देता है आत्मा की बंद खिड़कीवहां बिलकुल शब्दहीनअोस से भरी हवाएं प्रवेश कर सकती हैंदेह की दीर्घा की हर चीज़भीगी और ... आगे पढ़ें...
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 एक बार खिलता फूल कहूंगाएक बार जिगर में अंगाराएक बार गहराती रात कहूंगाएक बार झिलमिल ताराएक बार खिलता फूल कहूंगाएक बार जिगर में अंगाराएक बार गहराती रात कहूंगाएक बार झिलमिल ताराएक बार जागा सपना कहूंगाएक बार हाथ में लकीर एक बार धुनी रमाता कहूंगा एक बार गाता ... आगे पढ़ें...
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 अचानक बारिश तेज होने लगती है लेकिन मैं बारिश की परवाह किए बिना धीरे-धीरे चलने लगता हूं। मैं देखता हूं लोग भागते हैं और सिर छिपाने की जगह ढूंढ लेते हैं। कोई चाय के टपरे के नीचे या घने पेड़ के नीचे शरण लेता है। कोई आड़ ढूंढ़ लेता है, कोई छाते के नीचे बुला ... आगे पढ़ें...
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 बाहर पानी भरी सड़क पर इक्का -दुक्का वाहनों की आवाज़ें आती । बीच-बीच में नेपाली की सीटी की आवाज़ गूंजती सुनाई पड़ती और उसमें कुत्ते के भौंकने की आवाज अजब तरह से मिल जाती। कोई एक हे राम कहता हुआ निकल जाता। पेड़ों की सरसराहट से लगता बारिश बीच-बीच में तेज़ हो ... आगे पढ़ें...
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 बारिश की कई आवाज़ें मेरी स्मृति में बजती रहती हैं। नदी और झरने की नहीं, सिर्फ बारिश की आवाज़। और बारिशों की इतनी आवाज़ें थीं कि जब बारिश नहीं हो रही होती है तब भी मुझे बारिश की आवाज़ सुनाई देती रहती है। जैसे ही मां हम भाई-बहनों को आवाज़ लगाती, मुझे लगता ... आगे पढ़ें...
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 वह इससे बेखबर थी। न तारीख पता, न वार, न ये पता था कि दिन था या शाम। या अपने में ही गहराती कोई रात। धूप थी कि छांव। वह सोयी थी या जागी। जीवन में थी या स्वप्न में। पता नहीं, कोई एक खयाल कब उसके पास आकर हौले से बैठ गया। पहली नजर में उसने ध्यान नहीं दिया। जब ... आगे पढ़ें...
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 उसे पता नहीं था कि वह कब से वहीं खड़ी रह गई है, जहां वह उसे छोड़कर चला गया था। वह पतझड़ के मौसम में खड़ी थी और उसके हाथों में जो छुअन बाकी रह गई थी वह उसके अंदर एक भरे-पूरे वसंत में खिलकर महक रही थी। इसी महकते वसंत की लचकती शाख पर वह अपने प्रेम का अधखिला ... आगे पढ़ें...
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सुबह जब उठे तो हमें किसी ने नहीं देखा। फिर एक पेड़ हिला, उस पर चिडि़या बैठी, एक फूल झरा।एक गाय आई, एक कुत्ता।इनको भी किसी ने नहीं देखा।रात की रोटी दूसरे दिन दोपहर तक सूखती रही। बिल्ली दूध पीकर चली गई। मैं बारिश में भीगता हूं। छींकता हूं। मुझे भी कोई नहीं ... आगे पढ़ें...
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 अपनी कोई महीन बात को कहने के लिए गुलज़ार अक्सर कुदरत का कोई हसीन दृश्य चुनते हैं। कोई दिलकश दृश्य खींचते हैं, बनाते हैं। कोई एक दृश्य जिसमें पहाड़ है, कोहरा है, दरिया है या पेड़ या फिर धुँध में लिपटा कोई ख़ूबसूरत नजारा। उनकी नज्म किसी बिम्ब या दृश्य से ... आगे पढ़ें...
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 समकालीन हिंदी कविता के महत्वपूर्ण कवि कुमार अंबुज भी ब्लॉगर बन गए हैं। आज ही उन्होंने अपनी एक बेहतरीन पोस्ट डाली है। यह उनके गद्य का एक टुकड़ा है, शहर को देखने की उनकी अपनी नितांत नाजुक निगाह और शैली। इसे पढ़कर यह सहज ही अंदाज लगाया जा सकता है कि यह एक ... आगे पढ़ें...
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इस वक्त वह रसोईघर में खड़ी-खड़ीखिड़की से देख रही है बारिशआप उसकी गुनगुनाहट को सुन नहीं सकतेबारिश उसमें शामिल होकर उसे एक मीठे झरने में बदल रही हैहरे पत्तों के बीच जो पक्षी दुबका बैठा है वह उसे टुकुर टुकुर देखता हैवह अब धीरे-धीरे हंस रही हैऔर उसके गाल पर ... आगे पढ़ें...
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 गुलजार तारपीन तेल में कुछ घोली हुई धूप की डलियांमैंने कैनवास में बिखेरी थीं मगरक्या करूं लोगों को उस धूप में रंग दिखते ही नहीं!मुझसे कहता था थियो चर्च की सर्विस कर लूंऔर उस गिरजे की खिदमत में गुजारूंमैं शबोरोज जहां-रात को साया समझते हैं सभी, दिन को सराबों ... आगे पढ़ें...
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मैं गहरी नींद में था, स्वप्न देखता हुआ। उसमें किसी स्त्री के रोने की दबी दबी-सी आवाज थी। बीच-बीच में वह रूदन हिचकी में बदल जाता। टूटती सांसों के बीच रूदन की आवाज गूंजती थी। उसी रूदन से लिपटी हुई एक छोटे बच्चे के रोने की आवाज भी थी। यह रोना इस कदर ... आगे पढ़ें...
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 आज सुबह से बारिश विलंबित खयाल में थी। कभी द्रुत भी लेकिन देर तक विलंबित।बादल एक लय में तैर रहे हैं। पानी से भरे हुए। जहां मन होता है, बसरते हैं। पेड़ एक पैर पर खड़े होकर नाचते हैं। एक पेड़ किसी खयाल में खड़ा भीग रहा है। चुपचाप। लगता है, किसी इंतजार में ... आगे पढ़ें...
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