 वहां कैनवास पर पत्ते ही पत्ते हैं। झरते हुए, कभी एक साथ और कभी छितराए हुए। हरे-पीले, नारंगी-नीले, काले-भूरे। उजाले में आकर नाचते हुए, उदास हो कर अंधेरे में डूबते हुए। लगता है जैसे हरे-पीले पत्ते जीवन का राग गाते हुए स्वागत कर रहे हों, नारंगी-नीले वसंत के ... आगे पढ़ें...
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 उनके चित्रों में वे सेमल और पलाश के चटख फूल रूपायित हो रहे हैं जो उन्होंने अपने बचपन में कभी गांव में देखे थे। ये फूल उनके कैनवास पर बोल्ड स्ट्रोक्स और गहरे रंगों में खिलकर लोगों को आकर्षित कर रहे हैं। यही नहीं उन्होंने बांग्ला लेखिका तस्लीमा नसरीन के ... आगे पढ़ें...
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 कुमार अंबुज की कवितायहां पानी चांदनी की तरह चमकता हैआंधियां चलती हैं और मेरी रेत के ढूह उड़कर मीलों दूर फिर से बन जाते हैं यह मेरी अनश्वरता है यह दिन की चट्टान है जिस पर मैं बैठता हूंप्रतीक्षा और अंधकार। उम्मीद और पश्चातापवासना और दिसंबर। वसंत और धुआं मैं ... आगे पढ़ें...
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उनके चित्रों में वे सेमल और पलाश के चटख फूल रूपायित हो रहे हैं जो उन्होंने अपने बचपन में कभी गांव में देखे थे। ये फूल उनके कैनवास पर बोल्ड स्ट्रोक्स और गहरे रंगों में खिलकर लोगों को आकर्षित कर रहे हैं। यही नहीं उन्होंने बांग्ला लेखिका तस्लीमा नसरीन के ... आगे पढ़ें...
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 जयपुर में मेरे चित्रों की प्रदर्शनी 21 फरवरी से शुरू हो रही है। यह जयपुर जवाहर कला केंद्र की सुरेख कला दीर्घा में आयोजित होगी। इस प्रदर्शनी का उद्घाटन 21 फरवरी को शाम छह बजे करेंगे हिंदी के ख्यात कवि ऋतुराज जी। 27 फरवरी तक जारी रहने वाली इस प्रदर्शनी में ... आगे पढ़ें...
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 मेरी आत्मा झाग के थपेड़ों में नहा रही हैमुझे औरत की अंगुलियों के बारे में पता हैये अंगुलियां समुद्र की लहरों से निकलकर आती हैंऔर एक थके-मांदे पस्त आदमी कोहरे-भरे दरख्त में बदल देती हैजिसे तुम त्वचा कहते हो वह नदी का वसंत हैचांदनी में बहता हुआ इच्छाओं का ... आगे पढ़ें...
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 मुंबई में आतंकवादी हमले के घेरे में सौ से ज्यादा लोगों के मरने की खबरें और इस घेरे में घायलों की गूँजती चीखें इस घेरे का व्यास और मारकता ज्यादा बढ़ाती हैं। इस पागलपन का असर कहाँ तक गया है, इसका अंदाजा शायद राजनीतिज्ञों, अर्थशास्त्रियो, समाजशास्त्रियों, ... आगे पढ़ें...
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 हेमन्त शेष की कवितानर्म और सुगंधमयी कोंपलों की तरहफूट आती हैं नीलीकांपती हुई इच्छाएंअनसुने दृश्यों और अनदेखी आवाज़ों के स्वागत मेंप्रेम खोल देता है आत्मा की बंद खिड़कीवहां बिलकुल शब्दहीनअोस से भरी हवाएं प्रवेश कर सकती हैंदेह की दीर्घा की हर चीज़भीगी और ... आगे पढ़ें...
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 एक बार खिलता फूल कहूंगाएक बार जिगर में अंगाराएक बार गहराती रात कहूंगाएक बार झिलमिल ताराएक बार खिलता फूल कहूंगाएक बार जिगर में अंगाराएक बार गहराती रात कहूंगाएक बार झिलमिल ताराएक बार जागा सपना कहूंगाएक बार हाथ में लकीर एक बार धुनी रमाता कहूंगा एक बार गाता ... आगे पढ़ें...
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 अचानक बारिश तेज होने लगती है लेकिन मैं बारिश की परवाह किए बिना धीरे-धीरे चलने लगता हूं। मैं देखता हूं लोग भागते हैं और सिर छिपाने की जगह ढूंढ लेते हैं। कोई चाय के टपरे के नीचे या घने पेड़ के नीचे शरण लेता है। कोई आड़ ढूंढ़ लेता है, कोई छाते के नीचे बुला ... आगे पढ़ें...
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 बाहर पानी भरी सड़क पर इक्का -दुक्का वाहनों की आवाज़ें आती । बीच-बीच में नेपाली की सीटी की आवाज़ गूंजती सुनाई पड़ती और उसमें कुत्ते के भौंकने की आवाज अजब तरह से मिल जाती। कोई एक हे राम कहता हुआ निकल जाता। पेड़ों की सरसराहट से लगता बारिश बीच-बीच में तेज़ हो ... आगे पढ़ें...
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 बारिश की कई आवाज़ें मेरी स्मृति में बजती रहती हैं। नदी और झरने की नहीं, सिर्फ बारिश की आवाज़। और बारिशों की इतनी आवाज़ें थीं कि जब बारिश नहीं हो रही होती है तब भी मुझे बारिश की आवाज़ सुनाई देती रहती है। जैसे ही मां हम भाई-बहनों को आवाज़ लगाती, मुझे लगता ... आगे पढ़ें...
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 वह इससे बेखबर थी। न तारीख पता, न वार, न ये पता था कि दिन था या शाम। या अपने में ही गहराती कोई रात। धूप थी कि छांव। वह सोयी थी या जागी। जीवन में थी या स्वप्न में। पता नहीं, कोई एक खयाल कब उसके पास आकर हौले से बैठ गया। पहली नजर में उसने ध्यान नहीं दिया। जब ... आगे पढ़ें...
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 उसे पता नहीं था कि वह कब से वहीं खड़ी रह गई है, जहां वह उसे छोड़कर चला गया था। वह पतझड़ के मौसम में खड़ी थी और उसके हाथों में जो छुअन बाकी रह गई थी वह उसके अंदर एक भरे-पूरे वसंत में खिलकर महक रही थी। इसी महकते वसंत की लचकती शाख पर वह अपने प्रेम का अधखिला ... आगे पढ़ें...
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सुबह जब उठे तो हमें किसी ने नहीं देखा। फिर एक पेड़ हिला, उस पर चिडि़या बैठी, एक फूल झरा।एक गाय आई, एक कुत्ता।इनको भी किसी ने नहीं देखा।रात की रोटी दूसरे दिन दोपहर तक सूखती रही। बिल्ली दूध पीकर चली गई। मैं बारिश में भीगता हूं। छींकता हूं। मुझे भी कोई नहीं ... आगे पढ़ें...
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